लेबनान की संसद में “वफ़ादारी टू रेज़िस्टेंस” ब्लॉक के सदस्य हसन फज़्लुल्लाह ने कहा कि अमेरिका और कुछ अंदरूनी राजनीतिक समूहों के हालिया रुख, लेबनान के ताइफ़ समझौते और संविधान की भावना के खिलाफ हैं। शहीद याह्या मोहम्मद हदरज की याद में आयोजित एक कार्यक्रम में फज़्लुल्लाह ने कहा कि इस्राईली हमलों से निपटने को लेकर देश में दो अलग-अलग सोच मौजूद हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि आंतरिक मतभेद लेबनान को गंभीर संकट में डाल सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इस्राईल के खतरे का सामना राष्ट्रीय एकता और साझा समझ के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक गुटबंदी या क्षेत्रीय नजरिए से। हिज़्बुल्लाह के इस सांसद ने ताइफ़ समझौते का हवाला देते हुए कहा कि इसमें देश की ज़मीन को आज़ाद कराने के लिए सेना और हर संभव साधन के इस्तेमाल की बात कही गई है, और “प्रतिरोध” भी उन्हीं महत्वपूर्ण साधनों में से एक है।
उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों को नजरअंदाज करना या चुनिंदा तरीके से लागू करना संविधान और ताइफ़ समझौते दोनों का उल्लंघन है। फज़्लुल्लाह ने इस्राईल के साथ सीधे वार्ता के रास्ते को “खतरनाक” बताया और कहा कि 1996 के अप्रैल समझौते और कैदियों की रिहाई जैसी उपलब्धियां ताकत के आधार पर की गई अप्रत्यक्ष बातचीत से हासिल हुई थीं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका जिस राजनीतिक रास्ते को आगे बढ़ा रहा है, वह राष्ट्रीय और संवैधानिक ढांचे से हट चुका है और उसे सही रास्ते पर लौटना चाहिए।
फज़्लुल्लाह ने कुछ समूहों द्वारा अमेरिका पर भरोसा करने की आलोचना करते हुए कहा कि यह गलत सोच है और लेबनान को बाहरी दबावों के अनुसार नहीं चलना चाहिए। उनके अनुसार, लेबनान की जनता प्रतिरोध और आंतरिक एकता के बल पर इतनी मजबूत है कि वह विदेशी दबाव या हमलों के सामने आसानी से झुकेगी नहीं।
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