भारत-चीन वास्तविक सीमा रेखा (एलएसी) पर पिछले सात वर्षों में यह सातवां लंबा खिंचने वाला संकट है।
हालांकि दोनों ही देश तनाव कम करने की कोशिश भी कर रहे हैं और दोनों में से कोई भी बड़े टकराव में अपने हित नहीं देख रहा है। 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच गोलवान घाटी में ख़ूनी झड़प के बाद 22 यून को दोनों सेनाओं के वरिष्ठ कमांडरों के बीच 11 घंटों तक बैठक चली।
हालिया तनाव में कई ऐसे पेच फंसे हुए हैं, जिनका समाधान आसान नज़र नहीं आ रहा है। पहले तो यह कि उपग्रहों से मिलने वाली तस्वीरों में देखा जा सकता है कि गलवान में जहां 15 जून को झड़प हुई थी, उससे 100 मीटर भारत की सीमा के भीतर चीन की सेना ने रक्षा ढांचा खड़ा करके अपनी स्थिति को मज़बूत बनाने की कोशिश की है। अब यहां चीनी रक्षात्मक संरचनाएं, बंकर, सैनिकों की भारी संख्या और सैन्य वाहन दिखाई दे रहे हैं। चीन निरंतर सैनिकों की संख्या में वृद्धि कर रहा है और एलएसी के निकट देपसांग घाटी समेत दूसरे क्षेत्रों में बने ढांचों को ध्वस्त कर रहा है।
दूसरे यह कि अगर दोनों पक्ष 6 जून को बनी सहमति के रोडमैप पर की ओर लौटते हैं, जो गलवान नदी, देपसांग, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स जैसी कई साइटों को कवर करता है, तो भी पैंगोंग झील पर दक्षिण की ओर गंभीर टकराव की स्थिति बनी हुई है। हालिया वर्षों में झील के किनारे टिंडरबॉक्स बन गए हैं, जहां दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव होता रहता है। एलएसी पर कोई परस्पर समझौता नहीं होने की वजह से फ़िंगर -4 और फ़िंगर-8 नामक कई किलोमीटर तक का इलाक़ा झड़पों का केन्द्र बन गया है, जिसपर दोनों ही देश अपना दावा ठोंकते हैं और दोनों देशों के सैनिक गश्त करने की कोशिश करते हैं। विशेष रूप से चीन ने वहां अपनी स्थिति मज़बूत कर रखी है। उसने इस इलाक़े में 1999 में एक सड़क का निर्माण कर लिया था, जबकि भारतीय सैनिक पैदल ही गश्त करने के लिए मजबूर हैं।
पिछले महीने सैकड़ों चीनी सैनिक अपनी चौकियों से निकलकर फ़िंगर-4 के उत्तर में स्थित भारतीय सेना की चौकी तक पहुंच गए और उन्होंने वहां कैम्प स्थापित कर दिया, रास्ते में कई नई संरचनाओं का निर्माण कर दिया और ऊंची चोटियों पर क़ब्ज़ा कर लिया।
भारतीय मीडिया अब इस बहस में उलझा हुआ है कि क्या चीन ने भारत द्वारा जवाबी विकल्पों की समीक्षा करते हुए भारत के इन इलाक़ों पर प्रभावी रूप से क़ब्ज़ा किया है।
चीन के जो भी इरादे हों, आने वाले वर्षों में भारत को उसके साथ बड़े टकराव के लिए तैयार रहना चाहिए।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जून की शुरुआत में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को मालाबार में जापान-भारत-अमरीका त्रिपक्षीय नौसेना अभ्यास में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। 22 जून से, भारत की प्रमुख बंदरगाहों पर चीन से आयात की जाने वाली चीज़ों को रोक दिया गया है। यहां तक कि भारत के एक सबसे बड़े अख़बार मोदी सरकार को तिब्बत, ताइवान और हांगकांग को लेकर अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया और शंघाई सहयोग संगठन जैसे संगठनों से बाहर निकलने के लिए तैयार रहने का आग्रह किया।
चीन, भारत के सभी विकल्पों से अवगत है, यही वजह है कि भारत को नापसंद करने के बावजूद, बीजिंग ने दिल्ली के साथ रिश्ते बने रहने की कोशिशें की हैं। लेकिन यह एक नया चीन है, जो आक्रामक नीति अपनाने में विश्वास रखता है। यह ऐसा चीन है जो युद्ध जीतने का मतलब तो जानता है, लेकिन युद्ध हारने का मतलब भूल गया है।