पिछले दो महीनों से इराक़ में अशांति देखने में आ रही है। आरंभ में जनता की ओर से किए जाने वाले प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे लेकिन बाद में उन्होंने एक सुरक्षा संकट का रूप धारण कर लिया। पिछले दो महीने में इराक़ में कम से कम 120 सरकारी व निजी संस्थाओं के कार्यालयों को आग लगाई गई है कि जिसका जनता की मांगों से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि इससे पता चलता है कि इराक़ में संकट पैदा करने वाली इकाइयां पैदा होती जा रही हैं। इन्हीं इकाइयों की ताज़ा कार्यवाहियों में, जिनमें उनके तत्व अपने चेहरे छिपाए रहते हैं, हिंसा का बाज़ार गर्म किया जा रहा है। अब सरकार परिवर्तन, सुधार, भ्रष्टाचार से संघर्ष और अन्य आर्थिक मांगों से ज़्यादा इराक़ के धार्मिक नेतृत्व और इस्लामी गणतंत्र ईरान को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है।
पिछले कुछ दिनों में नजफ़ में ईरान के वाणिज्य दूतावास के कुछ भागों को आग लगाने के अलावा धार्मिक नेतृत्व के कार्यालयों पर भी हमले हुए हैं और इसी तरह धार्मिक नेतृत्व के बारे में अपमानजनक बातें कही गई हैं। अब सवाल यह है कि इराक़ में कौन है जो धार्मिक नेतृत्व और इस्लामी गणतंत्र ईरान से संबंध का विरोधी है? इस प्रकार के हमलों के पीछे कौन लोग हैं? किन लोगों ने एक महीने के अंदर कर्बला और नजफ़ में ईरान के वाणिज्य दूतावासों पर हमले किए हैं? और क्यों अमरीका व सऊदी अरब के हस्तक्षेप के विरोध में इराक़ियों के व्यापक प्रदर्शनों के बावजूद इन देशों के कूटनयिक केंद्रों पर हमले नहीं हुए हैं?
इन सवालों के जवाब में दो बिंदुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है। प्रथम यह कि नजफ़ में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर हमला करने वालों के बारे में इराक़ के सूत्रों ने कहा है कि इसमें अहमद शरबा और उसके लोगों का हाथ है जो वर्तमान सांसद अदनान ज़रफ़ी के निकटवर्ती हैं। इन्हीं लोगों ने इराक़ के धार्मिक नेतृत्व के कार्यालय पर भी हमला किया है। अदनान ज़रफ़ी ने हालिया महीनों में अमरीका से बहुत अधिक पींगें बढ़ाई हैं और उसके परिवार के सदस्य अमरीका में हैं। दूसरे यह कि ईरान व इराक़ के अनेक अहम लोगों का कहना है कि ये हमले और इसी तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को सुरक्ष संकट में बदलने का काम अमरीका, इस्राईल व सऊदी अरब के त्रिकोण का है। इसका उद्देश्य इराक़ को अशांत बनान और साथ ही ईरान से उसके संबंधों को बिगाड़ना है।
इराक़ी संसद में अलफ़त्ह गठजोड़ के सांसद मुहम्मद अलबलदावी ने खुल कर कहा है कि इराक़ के शांतिपूर्ण जन प्रदर्शनों को हिंसक रंग देने में अमरीका, संयुक्त अरब इमारात और फ़ार्स की खाड़ी के कुछ अन्य तटवर्ती अरब देशों का हाथ है। उनका कहना है कि इन देशों ने इराक़ में बहुत से मीडिया संस्थानों और लोगों को ख़रीद लिया है और हिंसा का प्रचार करके सरकार को गिराना और प्रदर्शनों को उनके मार्ग से हटाना चाहते हैं। बहरहाल अगर यह सुनियोजित सुरक्षा संकट जारी रहता है तो इराक़, आंतरिक झड़पों में फंस सकता है। इस लिए इराक़ी जनता, अहम लोगों, दलों व गुटों को संकट और फ़ितना पैदा करने वाली इन इकाइयों की ओर से बहुत होशियार रहना चाहिए।