इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सय्यद अली ख़ामेनई ने पूरे ईरान के विश्वविद्यालयों के छात्रों के एक गुट से भेंट में बल दिया कि ईरानी राष्ट्र की महाक्रान्ति निर्धारित उद्देश्य के साथ अस्तित्व में आयी और इतिहास में एक विशिष्ट घटना के रूप में अपने उद्देश्यों व मूल्यों के प्रति कटिबद्ध है। वरिष्ठ नेता ने कल हुयी इस भेंट में विश्व की क्रान्तियों के मार्ग से हट जाने की ओर संकेत करते हुए इस्लामी क्रान्ति की स्थिरता का उल्लेख किया और इस्लाम, साम्राज्य का विरोध, मानवता का सम्मान, पीड़ितों की रक्षा, प्रगति और ईरान के बहुमुखी विकास को इस्लामी क्रान्ति के मुख्य उद्देश्य गिनवाए और स्पष्ट किया कि इस सीधे मार्ग पर क्रान्ति गत बत्तीस वर्षों से बिना किसी ओर झुके हुए आगे बढ़ रही है। वरिष्ठ नेता की इस्लामी क्रान्ति और फ़्रांस व पूर्व सोवियत संघ की क्रान्तियों के बीच तुलनात्मक समीक्षा स्पष्ट करती है कि एक क्रान्ति का प्रभावी होना सिद्धांतों की रक्षा व मुख्य उद्देश्य से न हटने पर निर्भर है। विश्वविद्यालय जो समाज में महा वैज्ञानिक आंदोलन व स्थायी विकास की गैरेंटी के स्रोत समझे जाते हैं, ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के आरंभ से षड्यंत्रों का निशाना बने ताकि ईरानी राष्ट्र फिर से पिछड़ जाए इसलिए वरिष्ठ नेता ने छात्र संघों से गहरे व उद्देश्यपूर्ण सांस्कृतिक व वैचारिक कार्य करने की अनुशंसा की और राजनैतिक मामलों के संबंध में भी स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र में भावुक हुए बिना कार्य किया जाना चाहिए।जो बात स्पष्ट है वह यह कि गत बत्तीस वर्षों से ईरान एक प्रभावी आदर्श के रूप में विश्व में न्याय के इच्छुक राष्ट्रों के ध्यान का केन्द्र बना हुआ है कि जिसका प्रभाव न केवल ईरानी राष्ट्र व इस्लामी व्यवस्था के सम्मान के रूप में प्रकट हो रहा है बल्कि साथ ही इसका प्रभाव क्षेत्रीय राष्ट्रों की क्रान्तियों में भी दिखाई दे रहा है। अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी मोर्चा आज इस बात को भलिभांति समझ चुका है कि क्षेत्र में जनक्रान्तियों का आदर्श ईरानी की इस्लामी क्रान्ति है इसलिए वह ईरान की इस्लामी क्रान्ति को एक विफल अनुभव दर्शाने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए हुए है। (एरिब डाट आई आर के धन्यवाद के साथ).....166