हज़रत मासूमा (स) इमाम काज़िम (अ) की बेटी हैं, जिनका आध्यात्मिक और इल्मी मक़ाम बहुत बुलंद है और वह क़यामत के दिन शियों की शिफ़ाअत करेंगी। इमाम काज़िम (अ) के परिवार पर दबाव और सियासी बंदिशों के कारण उन्होंने शादी नहीं की और सन् 201 हिजरी में, अपने भाई (इमाम रज़ा अ) से मिलने के इरादे से ख़ुरासान की ओर रवाना हुईं। जब वह सावेह पहुँचीं तो बीमार पड़ गईं और क़ुम जाने के बाद आपका इंतेकाल हो गया। आपकी पाकीज़ा क़ब्र की ज़ियारत करना बेहद सवाब का काम है। क़ुम में आपका मज़ार इस शहर के लिए बहुत बरकतें लेकर आया है; जिनमें से एक क़ुम का हौज़ा-ए-इल्मिया भी है।
हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का जन्म इमाम रज़ा (अ) के जन्म के 25 वर्ष बाद हुआ। आपके जन्मदिन के बारे में मतभेद है; एक क़ौल के अनुसार, ज़िल-क़ादा की 1 तारीख़ सन् 173 हिजरी को हज़रत फ़ातिमा मासूमा (अ) का जन्मदिन है। आपके बाबा इमाम मूसा बिन जाफ़र (अ) हैं और माँ 'नजमा' थीं। जब हज़रत रज़ा (अ) की विलादत हुई तो इमाम काज़िम (अ) ने उन्हें 'ताहिरा' नाम दिया; उनके दूसरेनाम भी थे, जिनमें 'नजमा', 'उरवा', 'सकन', 'समाना' और 'तुकतम' (जो उनका अंतिम नाम था) शामिल हैं।
हज़रत फ़ातिमा बिन्त इमाम काज़िम (अ) का सबसे अहम लकब 'मासूमा' है, जो इमाम रज़ा (अ) नकल एक हदीस से लिया गया है जहाँ आपने फ़रमाया: "जिसने क़ुम में मासूमा (अ) की ज़ियारत की, उसने मानो मेरी ज़ियारत की।"
हज़रत मासूमा (स) का मक़ाम
हज़रत मासूमा (स) इमाम काज़िम के बाद, सन् 179 में अपने भाई हज़रत इमाम रज़ा (अ) के संरक्षण में आ गईं और सन् 200 हिजरी तक, यानी पूरे 21 वर्ष, अपने भाई के साथ रहकर इल्म और रुहनीयत एवं अखलाक़ी कमालात को हासिल किया।
शिफ़ाअत का ओहदा : इस अज़ीम खातून का अहल-ए-बैत (अ) के यहाँ इतना बुलंद मक़ाम है कि इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमाया: "सुनो! जन्नत के आठ दरवाज़े हैं, जिनमें से तीन क़ुम की ओर हैं। मेरी संतान में से एक खातून, जिसका नाम फ़ातिमा बिन्त मूसा है, वहाँ (क़ुम में) रहलत फरमाएगी। और मेरे सभी शियों को उसकी शिफ़ाअत से जन्नत में दाखिला दिया जाएगा।"
साथ ही, आपके मशहूर ज़ियारतनामे के एक हिस्से में जो इमाम रज़ा (अ) से मनकूल किया गया है, हम पढ़ते हैं: "ऐ फ़ातिमा! मेरे लिए जन्नत में शिफ़ाअत करना, क्योंकि अल्लाह के यहाँ आपका एक बहुत बड़ा मक़ाम है।"
इल्मी और हदीस : हज़रत मासूमा (स) इल्म और हदीस के नजरिए से अपनी माँ हज़रत ज़हरा (स) की तरह 'आलिमा' और 'मुहद्दिसा' (हदीस कहने वाली) थीं। जिस तरह हज़रत ज़हरा (स) ने ठोस और मजबूत तर्कों के साथ हज़रत अली (अ) की विलायत की सच्चाई को जाहिर किया, उसी तरह हज़रत मासूमा (स) भी थीं। उनसे रिवायत की गई ज्यादातर हदीसे हज़रत अली (अ) की इमामत और विलायत के बारे में हैं, जिसके साथ उनकी विलायत साबित करके अन्य मासूम इमामों की विलायत भी साबित हो जाती है।
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