16 अगस्त 2020 - 13:32
ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगवाने में नाकामी से झल्लाए ट्रम्प क्या अब सुरक्षा परिषद का ही बहिष्कार कर देंगे?

ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंध की समय सीमा में विस्तार के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में अमरीका द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव की एक ही बैठक में और बिना वीटो के ही बुरी तरह से विफलता ने यह दिखा दिया है कि अमरीका को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार की ज़रूरत है।

अब से पहले तक सुरक्षा परिषद में अमरीका के प्रस्तावों की मंज़ूरी की राह में जो एकमात्र रुकावट हुआ करती थी वह रूस व चीन की ओर से इन प्रस्तावों को वीटो किया जाना था क्योंकि अमरीका धमकी और लालच के माध्यम से परिषद के अन्य सदस्यों के वोटों को अपने पक्ष में करवा लिया करता था लेकिन इस बार ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंधों की समय सीमा बढ़वाने का उसका प्रस्ताव बिना वीटो के ही और एक ही साधारण बैठक में ख़ारिज कर दिया गया जो अमरीका के लिए बड़ी शर्मनाक हार है और उसे अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

 

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने इस प्रस्ताव के पक्ष में अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने के लिए काफ़ी समय लगाया था और अनेक देशों की यात्राएं की थीं जिन पर अमरीका का बड़ा ख़र्चा भी आया था लेकिन ध्यान योग्य और साथ ही हास्यास्पद बिंदु यह है कि जिन देशों ने वाॅशिंग्टन का समर्थन किया है उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई हैसियत ही नहीं है और बाद में यह भी स्पष्ट हो गया कि उनका समर्थन फ़र्ज़ी था। उदाहरण स्वरूप जब क़तर ने यह घोषणा की कि वह ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंधों की समय सीमा बढ़ाने के फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद के बयान के पक्ष में नहीं है, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि वह अमरीकी प्रस्ताव का भी व्यवहारिक रूप से समर्थन नहीं करेगा। पोम्पियो ने पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण हर जगह की यात्रा की लेकिन अंततः सुरक्षा परिषद में मतदान का जो परिणाम सामने आाय वह अमरीका के मुंह पर एक ज़ोरदार थप्पड़ के समान था और उसने अमरीका के मन से यह भ्रम निकाल बाहर किया कि दुनिया पर उसका एकछत्र राज है।

 

यूरोप वाले ट्रम्प सरकार को क्रोधित नहीं करना चाहते थे इसी लिए उन्होंने मतदान में भाग ही नहीं लिया लेकिन तटस्थ वोट डाल कर उन्होंने भी वाॅशिंग्टन को यह अहम संदेश दे दिया कि अब यूरोप विशेष कर फ़्रान्स और ब्रिटेन, परमाणु मामले में ट्रम्प की नीतियों का आंख बंद करके पालन नहीं करेंगे। यूरोप वाले जानते हैं कि यह अमरीका ही था जो परमाणु समझौते से बाहर निकल गया था और फिर उसने ईरान के ख़िलाफ़ एकपक्षीय प्रतिबंध लगा दिए जिसकी वजह से यह समझौता समाप्ति की कगार पर पहुंच गया था। दूसरी ओर ईरान ने परमाणु समझौते के अंतर्गत अपनी सभी कटिबद्धताओं का पालन किया है इस लिए अमरीकी प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने का मतलब यह है कि कोई नया घटनाक्रम सामने आने वाला है और परमाणु समझौता समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद परिस्थितियां अक्तूबर 2015 से पहले की ओर लौट जाएंगी।

 

इन हालात में ट्रम्प सरकार के पास ईरान के ख़िलाफ़ पेश किए गए प्रस्ताव के समर्थन के लिए देशों को डराने के अलावा और कोई चारा नहीं था लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ताक़त अब भी अमरीकी सरकार के ही हाथ में है। इस लिए बेहतर है कि अमरीका अपनी नीतियों पर गहन पुनर्विचार करे जिनके चलते उसके घटक, उसके दुश्मनों से भी पहले उससे दूर होते जा रहे हैं। हक़ीक़त यह है कि अमरीका अब अकेले ही परमाणु समझौते या किसी भी अन्य अंतर्राष्ट्रीय समझौते के बारे में फ़ैसला नहीं कर सकता विशेष इस लिए भी अब अधिकतर देशों का यह मानना है कि ट्रम्प की नीतियां, क्षेत्र व दुनिया की शांति व स्थिरता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं।

 

दूसरी बात यह है कि अमरीका व उसके यूरोपीय घटकों के संबंधों में बदलाव आ रहा है और इस बात कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वाॅशिंग्टन ने अपने घटकों को सज़ा देने और उन पर दबाव डालने के लिए कुछ क़दम उठाएं हैं। उसने यूरोपीय देशों पर परमाणु समझौते से बाहर निकलने के लिए भी बहुत दबाव डाला था लेकिन यूरोप, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी की आख़री कसौटी में विफल नहीं रहना चाहता था इस लिए उसने अमरीका की बात नहीं मानी और परमाणु समझौते में बना रहा।

 

अंतिम बात यह है कि सुरक्षा परिषद में बुरी तरह पराजित होने के बाद अमरीका को अब परमाणु समझौते पर प्रभाव डालने की किसी भी नई कोशिश से दूर रहना चाहिए चाहे वह नया समझौता हो जिसकी ट्रम्प बात कर रहे हैं या फिर अगले चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत की स्थिति में परमाणु समझौते में दोबारा शामिल होने का इरादा हो क्योंकि वाॅशिंग्टन ने अपने दोस्तों और दुश्मनों के ख़िलाफ़ सारे हथकंडे इस्तेमाल कर लिए हैं और अब उसके पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है कि वह ख़ुद सुरक्षा परिषद पर ही प्रतिबंध लगा दे।