सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 26 और 27 का अनुवादः
और ईश्वर, किताब वालों (अर्थात यहूदियों) में से जिन लोगों ने उन (अनेकेश्वरवादियों) की सहायता की थी, उन्हें उनके मज़बूत दुर्गों से उतार लाया और उनके दिलों में भय व आतंक बिठा दिया कि तुम (उनमें से) एक गुट की हत्या करते और एक गुट को बन्दी बनाते थे। और उसने तुम्हें उनकी ज़मीन, उनके घरों और उनके मालों का वारिस बना दिया और उस ज़मीन का भी जिस पर तुमने क़दम भी नहीं रखा था। और ईश्वर हर चीज़ में सक्षम है।
संक्षिप्त टिप्पणी:
इस्लामी समाज के मामलों के संचालन में भौतिक समीकरणों के साथ ही ईश्वरीय सहायताओं की भी आशा रखनी चाहिए।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
- इस्लाम, ग़ैर मुस्लिमों के साथ शांतिपूर्ण जीवन बिताने की सिफ़ारिश करता है अलबत्ता तभी तक जब तक वे भी मुसलमानों के साथ शांति के साथ जीवन बिताएं और इस्लाम के दुश्मनों से सहयोग न करें।
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दुश्मनों के विकसित उपकरणों व संभावनाओं को देख कर कमज़ोर नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि ईश्वर कभी कभी उनके हृदय में भय व आतंक डाल कर हमें विजयी बना देता है।
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इस्लामी समाज के मामलों के संचालन में भौतिक समीकरणों के साथ ही ईश्वरीय सहायताओं की भी आशा रखनी चाहिए।