23 मार्च 2020 - 13:35
कोरोना पूरी दुनिया के लिए मुसीबत और ख़तरा पर नेतनयाहू के लिए मोक्षदाता व स्वर्ण अवसर!!!

ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनयाहू कोरोना वायरस के फैलाव को एक सुनहरी अवसर समझते हैं जिसके माध्यम से वे भ्रष्टाचार के केस से बच कर इस्राईल के राजनैतिक मंच पर बने रह सकते हैं।

कोरोना दुनिया के ज़्यादातर इलाक़ों में एक भयावह त्रासदी है और इसने दुनिया के मज़बूत आर्थिक देशों और इसी तरह तेल पैदा करने वाले देशों को तबाही की कगार पर पहुंचा दिया है लेकिन यही वायरस इस्राईल के प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू के लिए एक स्वर्णिम अवसर और बचाव का फ़रिश्ता बना कर आया है। उन्होंने कोरोना की वजह से पैदा होने वाले हालात से फ़ायदा उठा कर कम से कम अपनी कुछ इच्छाओं को तो व्यवहारिक बना ही लिया है जिन्हें वे पिछले एक साल से पूरा करने में अक्षम थे और इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने तीन-तीन चुनाव करा डाले थे लेकिन फिर भी इनमें से उनकी कोई भी इच्छा पूरी नहीं हुई थी।

 

नेतनयाहू की एक अहम इच्छा यह थी कि उन्हें आर्थिक भ्रष्टाचार के केस से मुक्ति मिल जाए क्योंकि इस केस में सज़ा होने की स्थिति में वे दोबारा प्रधानमंत्री बनने की योग्यता खो देते। कोरोना की वजह से जो हालात पैदा हो गए उनके चलते, वह अदालत ही कई महीने के लिए स्थगित हो गई जो नेतनयाहू के भ्रष्टाचार के केस की सुनवाई कर रही थी। उनके केस की सुनवाई पिछले हफ़्ते होने वाली थी लेकिन अदालत का स्थगन, नेतनयाहू के लिए स्वर्णिम अवसर है जिससे फ़ायदा उठा कर वे गठबंधन सरकार बनाने की फिर से कोशिश कर सकते हैं। हालांकि ब्ल्यू-वाइट पार्टी के प्रमुख बेनी गेनेट्ज़ ने गठबंधन सरकार में शामिल होने के उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था लेकिन नेतनयाहू ने अब एक नया पैंतरा अपनाया है और तीन साल के लिए गठबंधन सरकार बनाने और डेढ़-डेढ़ साल तक प्रधानमंत्री का पद अपने और बेनी गेनेट्ज़ के बीच रखने की बात कही है। अगर यह समझौता हो जाता है तो नेतनयाहू अगले डेढ़ साल तक इस्राईल के प्रधानमंत्री बने रहेंगे और उन्हें इस पद के कारण क़ानूनी छूट मिल जाएगी और वे अदालत की सुनवाई को फिर से स्थगित करवाने की कोशिश करेंगे।

 

ज़ायोनी संसद कनेसेट को बंद करना और विपक्षी नेताओं पर कड़ी नज़र रखना या उन्हें गिरफ़्तार करना उन आदेशों में से हैं जो नेतनयाहू ने कोरोना से मुक़ाबले के बहाने जारी किए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि इन आदेशों के माध्यम से नेतनयाहू ने अपनी 11 वार्षीय तानाशाही के आधारों को पहले से ज़्यादा मज़बूत बना लिया है। दूसरी ओर ज़ायोनी प्रधानमंत्री ने कोरोना की समस्या के बहाने, फ़ार्स की खाड़े के कुछ अरब देशों में इस्राईल की जासूसी संस्था मूसाद की भूमिका और उसकी स्थिति को दोबारा मज़बूत बनाने की कोशिश की है और इस संबंध में बताया गया है कि मूसाद ने कोरोना के टेस्ट की एक लाख किट्स, एक ऐसे अरब देश से आयात की हैं जिससे इस्राईल के राजनैतिक संबंध नहीं हैं। संभावित रूप से यह देश सऊदी अरब, क़तर या संयुक्त अरब इमारात हो सकता है। इस बात के मद्देनज़र कि यह तीनों ही देश ख़ुद ही कोरोना वायरस से मुक़ाबला कर रहे हैं और उनके पास इस संबंध में पर्याप्त अनुभव नहीं है, यह संभावना मज़बूत हो जाती है कि यह ख़बर निराधार हो लेकिन नेनयाहू ने इस ख़बर के माध्यम से फ़ार्स की खाड़ी के कुछ अरब देशों के साथ संपर्क पुल बनाने को विदेश नीति के मैदान में अपने सफल कामों में दर्शाने की कोशिश की है। इसके माध्यम से वे आंतरिक स्तर पर अपनी विफलताओं को छिपाने और आलोचनाओं को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।