मनामा : बहरैन की अदालत ने हिरासत में लिए गए शिया उलमा के मामले में अंतिम दलीलें सुनने की कार्यवाही एक बार फिर टाल दी है। अब अगली सुनवाई रविवार, 11 अक्टूबर को होगी। यह जानकारी समाचार एजेंसी अबना की रिपोर्ट में दी गई है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता सय्यद अहमद अल-वदाई के मुताबिक, सुनवाई के दौरान शिया उलमा को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश करने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया। इनमें प्रमुख शिया धर्मगुरु शेख मोहम्मद संकूर, शेख महमूद आली, शेख अली सद्दीदी और शेख हानी अल-बन्ना शामिल हैं।
अल-वदाई ने कहा कि मुकदमे की कार्यवाही गोपनीय तरीके से हुई और इसकी अध्यक्षता न्यायाधीश जासिम अल-अजलान ने की। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में निष्पक्ष सुनवाई के मानकों का गंभीर उल्लंघन हुआ है।
उनके अनुसार, मामले में उलमा को प्रताड़ित करने, डराने-धमकाने और दबाव डालकर कबूलनामे हासिल करने के आरोप भी सामने आए हैं।
वहीं, अब्दुलगनी खंजर ने एक विशेष सूत्र के हवाले से कहा कि सुनवाई की तैयारी सामान्य तरीके से नहीं हुई थी। उनके मुताबिक, सुबह सात बजे से ही उलमा को तैयार करके वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई के लिए पेश किया गया।
खंजर ने दावा किया कि शेख मोहम्मद संकूर ने खुद अपनी और अन्य उलमा की ओर से बचाव में दलीलें दीं। उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायाधीश अल-अजलान ने उन्हें अपना पक्ष रखने से रोकने की कोशिश की।
रिपोर्ट के मुताबिक, बहरैन के अल-खलीफा शासन ने 50 से ज्यादा शिया उलमा, धार्मिक शिक्षकों और अलग अलग मस्जिद के इमामों को हिरासत में लिया है। इसके अलावा, कई अन्य शिया नागरिकों पर भी मुकदमे चलाए जा रहे हैं।
रिपोर्ट में इन गिरफ्तारियों को ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राईल के हमले तथा उस हमले का विरोध करने से जोड़ा गया है।
अभियोजन पक्ष के आरोपों के अनुसार, उलमा पर एक कथित आतंकवादी संगठन बनाने और चलाने का आरोप है। उन पर संविधान और कानूनों को निलंबित कराने, सरकारी संस्थाओं के कामकाज में बाधा डालने, राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को बदलने की कोशिश करने के आरोप भी लगाए गए हैं।
आरोपों में यह भी कहा गया है कि यह उलमा ईरान की इस्लामी क्रांति से जुड़ी विचारधारा और विलायत-ए-फकीह की अवधारणा को बढ़ावा देकर ईरान के सर्वोच्च नेता पर बहरैन की निर्भरता बढ़ाना चाहते थे।
इसके अलावा, अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने धार्मिक स्थलों, शोक सभाओं और इमाम बारगाहों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ विचार फैलाने, विद्रोह के लिए उकसाने और देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों को समर्थन देने के लिए किया।
हालांकि, ये सभी आरोप हैं। मामले में धर्मगुरुओं का पक्ष और अदालत का अंतिम फैसला सामने आना बाकी है।
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