अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के ट्रिब्यूनल में गाम्बिया के न्याय मंत्री अबुबक्र ताम्बादो ने कहाः "गाम्बिया की जनता आपसे अपील करती है कि आप म्यांमार को इन बेहूदा हत्याओं को रोकने का आदेश दें।
उन्होंने कहाः "इस बर्बरता और क्रूरता को रोकने के लिए जिसने हमारे सामूहिक विवेक को झकझोर के रख दिया हैं। अपने ही लोगों के इस नरसंहार को रोका जाना चाहिए।"
2017 में रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के नरसंहार और सामूहिक पलायन के मामले में पहला अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी प्रयास, 11 नवंबर को गाम्बिया ने ICJ में एक आवेदन दायर करके किया।
इस आवेदन में म्यांमार पर 1948 के नरसंहार कन्वेंशन के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
यहां सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि म्यांमार की नेता और नोबल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की ने संयुक्त राष्ट्र के उच्च न्यायालय में रोहिंग्या मुसलमानों की नस्लकुशी के लिए अपने देश का बचाव किया है।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में वह म्यांमार की विदेश मंत्री के रूप में एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही हैं और आशा के अनुसार बुधवार को होने वाली सुनवाई में वह रोहिंग्या मुसलमानों के जनसंहार के आरोपों का खंडन करेंगी।
गाम्बिया ने अदालत से अपील की है कि वह म्यांमार में रोहिंग्याओं के नरसंहार, बलात्कार और यौन शोषण, गांवों और घरों को आग लगा देने, खेतों और आजीविका को नष्ट कर देने, खाद्य पदार्थों और जीवन की अन्य बुनियादी ज़रूरतों को तबाह कर देने तथा अन्य हर वह कृत्य जो रोहिंग्या समूह को मिटा देने के लिए उद्देश्य से किया जा रहा है, उसे रोका जाए।
ग़ौरतलब है कि 2017 में म्यांमार की सेना और बौद्ध चरमपंथियों ने रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के गांवों और बस्तियों पर व्यवस्थित रूप से हमले किए थे, जो आज भी जारी हैं। इन हमलों से बचने के लिए 7 लाख से अधिक रोहिंग्याओं ने भागकर पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ली थी।
राष्ट्र संघ के जांचकर्ता अपनी जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंचे थे कि म्यांमार सेना ने यह हमले नरसंहार के इरादे से किए थे।
इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स के एक कमिश्नर रीड ब्रॉडी ने कि जो चाड के पूर्व राष्ट्रपति हिसेन हेबरे के मुक़दमे में सहायक थे, अल-जज़ीरा से बात करते हुए कहाः "यह आंग सान सू की जैसी नेता के लिए अजीब बात है, जो ICJ में क़ानूनी मामले में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।"
उन्होंने कहाः क़ानूनी तौर पर इस तरह की भूमिका निभाने के लिए यह सू की पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए कि वह इस मामले का राजनीतिकरण कर रही हैं। मुझे संदेह है कि न्यायाधीश म्यांमार के प्रतिनिधिमंडल से प्रभावित होंगे।
म्यांमार ने रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार के आरोपों का हमेशा खंडन किया है।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ, दुनिया भर के कई नेताओं, मानवाधिकार संगठनों, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और जान बचाकर भागने वाले रोहिंग्याओं का कहना है कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों का यूजनाबद्ध ढंग से नरसंहार किया गया है और उनके बच्चों और महिलाओं के साथ सामूहिक रेप जैसे बर्बरतापूर्ण जघन्य अपराध किए गए हैं।