आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने पिछले एक सप्ताह के दौरान ईरानी राष्ट्र की महान कोशिशों पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अपने इस काम से ईरानी राष्ट्र ने शत्रु के बहुत ही सुनियोजित और ख़तरनाक षडयंत्र को विफल कर दिया।
वरिष्ठ नेता ने बुधवार को तेहरान में बसीज अर्थात स्वयंसेवियों को संबोधित करते हुए उन्हें बसीज सप्ताह की बधाई दी। उन्होंने कहा कि हालिया षडयंत्र के लिए शत्रु ने बहुत धन ख़र्च किया था और इस मौक़े की तलाश में था कि उचित अवसर पर इसे लागू किया जाए। शत्रु यह सोच रहा था कि तेल का मामला उनके लिए बहुत अच्छा बहाना है इसीलिए उसने इसकी आड़ में अपने तत्वों को मैदान में उतारा किंतु ईरानी राष्ट्र ने उसकी चालों को विफल बना दिया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने कहा कि देश के विभिन्न नगरों में जनता की रैलियां, वर्चस्ववाद और विश्व ज़ायोनिज़्म के मुंह पर एक तमाचा थीं।
वरिष्ठ नेता ने वर्चस्ववादी व्यवस्था को ईरानी राष्ट्र का शत्रु बताते हुए स्पष्ट किया कि बसीज या स्वयंसेवी सेना जहां देश की जनता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है वहीं पर वह हमेशा शत्रु के षडयंत्रों की ज़द में भी है। शत्रु इस संस्था के लिए समस्याएं उत्पन्न करना चाहता है जबकि इस मुक़ाबले में निश्चित रूप से बसीज को ही सफलता मिलेगी। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इस बात को स्पष्ट किया कि इस्लामी व्यवस्था को सदैव ही क्यों ख़तरों का सामना रहा है। उन्होंने कहा कि इस्लामी व्यवस्था, इस्लामी मूल्यों पर आधारित है। वरिष्ठ नेता का कहना था कि इस्लाम शांति, स्वतंत्रता और न्याय का ध्वजवाहक है।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने यूरोप और अमरीका तथा अन्य देशों में न्याय एवं आज़ादी के मुक़ाबले में वर्चस्ववादी व्यवस्था की कार्यवाहियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस व्यवस्था ने सदा ही राष्ट्रों की स्वतंत्रता का विरोध किया और उनका अपमान किया। उनको अपनी करनी पर कोई पछतावा नहीं है। जैसाकि अमरीका खुलकर कहता है कि हम सीरिया के तेल के लिए ही पूर्वी फ़ुरात आए हैं या वे बिना अनुमति के इराक़ में अपनी छावनियों में जा रहे हैं। इन कामों से उनको कोई पछतावा नहीं है।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने बल देकर कहा कि ईरान में बसीज जैसी स्वयंसेवी सेना और इसी प्रकार कुछ अन्य देशों में इसी प्रकार की सेनाओं को वर्चस्ववादी व्यवस्था से अधिक ख़तरा है जैसाकि इराक़ में हश्दुश्शाबी को और लेबनान में हिज़बुल्लाह को अधिक विरोध का सामना है।