28 अक्टूबर 2019 - 14:02
आइए नार्वे से सीखें! यह सीखें कि युद्ध की आग भड़काने और जलाए रखने पर निवेश करने के बजाए वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए कैसे निव

आज हम नार्वेजियन सावरेन वेल्थ फ़ंड की बात अगर करना चाहते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि हम इराक़ और लेबनान में हो रहे प्रदर्शनों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, हमारा उद्देश्य यह है कि हम आगे की ओर देखें और सावधान करना चाहते हैं कि कहीं यह प्रदर्शन उन तेल संपन्न धनी देशों में न पहुंच जाएं जहां की सरकारों ने देश का पैसा दोनों हाथों से लुटाया और बर्बाद किया है।

नार्वे की अगर बात की जाए तो वहां के राष्ट्रीय फ़ंड ने दुनिया में एक नया उदाहरण स्थापित करते हुए अपना आकार 1 ट्रिलियन डालर से अधिक तक पहुंचा लिया है। इस फ़ंड की स्थापना वर्ष 1996 में हुई। उस समय इसकी शुरुआत लगभग 20 करोड़ डालर से की गई थी। आज यही फंड बढ़कर 1 ट्रिलियन डालर से अधिक हो गया है और देश को तेल और गैस से होने वाली आमदनी से अधिक पैसा दे रहा है। यह देश रोज़ाना 15 लाख बैरल तेल पैदा करता है। अगर इसकी तुलना सऊदी अरब के पब्लिक इन्वेस्टमेंट फ़ंड से की जाए तो अंतर बहुत साफ़ नज़र आएगा। सऊदी अरब रोज़ाना एक करोड़ बैरल से अधिक तेल का उत्पादन करता है जबकि उसका पीआईएफ़ 875 अरब डालर है।

नार्वे की आबादी 53 लाख है। इस देश ने यह चमत्कार किया है और रिटायर्ड लोगों को सालाना दो लाख डालर दे रहा है जबकि भावी पीढ़ियों के लिए भी अच्छा बंदोबस्त कर दिया है। इस देश ने तेल से होने वाली आमदनी को बहुत सटीक योजना के साथ प्रयोग किया और बड़े उचित ढंग से पूंजीनिवेश किया। इस फंड का संचालन पढ़े लिखे और समझदार लोगों के हाथ में है। उन्हें मालूम है कि शेयर बाज़ार में, तकनीक पैदा करने वाली कंपनियों में और अन्य क्षेत्रों में किस तरह निवेश किया जाना चाहिए।

लेकिन इस समय तेल पैदा करने वाले अरब देश अपनी आमदनी को युद्ध की आग भड़काने और जलाए रखने में जिस तरह बर्बाद कर रहे हैं, जिस तरह वह अमरीकी सैनिक छावनियों के ख़र्च उठा रहे हैं और इन सबसे बढ़कर वह जिस अंदाज़ से अमरीका से सैकड़ों अरब डालर के हथियार ख़रीद रहे हैं वह ज़ाहिर करता है कि ईश्वर की ओर से मिली इस नेमत का वह कितना अपमान करते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों की उनकी नज़र में कोई हैसियत नहीं है।

पहले तो यह सरकारें कहा करती थीं कि हम अरब दुनिया के मुख्य मुद्दों विशेष रूप से फ़िलिस्तीन मुद्दे के लिए तेल से होने वाली आमदनी ख़र्च कर रहे हैं मगर अब यह सिद्धांत ही उलट गया है। अब यही पैसा अरब जगत को बर्बाद करने और सीरिया, लीबिया तथा यमन जैसे देशों का विनाश करने के लिए ख़र्च किया जा रहा है।

हम नार्वे की परिस्थितियों का उल्लेख इस लिए कर रहे हैं कि यह पता चले कि हमारे अरब देशों में किस तरह योजनाबद्ध रूप से भ्रष्टाचार हो रहा है, किस तरह विशेषज्ञों को हाशिए पर डाल दिया गया है। यह सारी बातें इस प्रकार की हैं कि कभी भी इनके चलते जनता का आक्रोश ज्वालामुखी की तरह फट सकता है।