5 अक्टूबर 2019 - 12:45
क्या बिन सलमान ने ट्रम्प पर भरोसा करके ग़लती कर दी? सऊदी अरब ने तीन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के माध्यम से ईरान को क्या संदेश दि

सऊदी अरब ने तीन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के माध्यम से यमन संकट के समाधान के लिए हरी झंडी दिखा दी है और ईरान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है।

ऐसा लगता है कि अब सऊदी अरब को ट्रम्प सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है लेकिन क्या वह ऐसा फ़ैसला करना चाहता है जो तेहरान से दोस्ती के पक्ष में हो? कुछ राजनैतिक टीकाकारों का कहना है कि सऊदी अरब ने इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और फ़्रान्स के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां को इस बात की ज़िम्मेदारी दी है कि वह रियाज़ को, यमन के दलदल से बाहर निकालने का शांतिपूर्ण रास्ता तलाश करने के लिए ईरान से वार्ता करें। टीकाकारों का कहना है कि जब सऊदी अरब को यह विश्वास हो गया कि अमरीका उसके पक्ष में ईरान के ख़िलाफ़ किसी युद्ध में शामिल होने के लिए तैयार नहीं है तो उसने अपने मध्यस्थों के माध्यम से यह संदेश भेजा कि उसके लिए सबसे बुरी अमरीका व ईरान के बीच वार्ता है विशेष कर जब ईरान ने अमरीका के ड्रोन को भी मार गिराया है।

 

कुछ टीकाकारों का मानना है कि सऊदी अरब अब और अधिक नुक़सान बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसके दो कारण हैं, एक तो यह कि आरामको पर यमनियों की एक बड़ी कार्यवाही ने सऊदी अरब की तेल की पैदावार को घटा कर पचास प्रतिशत कर दिया है। दूसरे यह कि अमरीकी सरकार, यमन में सऊदी अरब के अपराधों पर पर्दा डालने में सफल नहीं हो पाई है और इसी लिए वह रियाज़ पर यमन युद्ध समाप्त करने के लिए दबाव डाल रही है। टीकाकारों का कहना है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान इस निष्कर्ष तक पहुंच चुके हैं कि वे यमन से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे क्योंकि यमनी जियालों ने सऊदी अरब के अत्यंत विकसित हथियारों व डिफ़ेंस सिस्टम के बावजूद पूरी दुनिया के सामने आश्चर्यजनक साहस का प्रदर्शन किया और सऊदी अरब पर इतने कड़े प्रहार किए कि जिन्हें सहन करना सऊदी अरब के लिए बहुत कठिन है। यही वजह है कि बिन सलमान, अब ट्रम्प पर बिलकुल भी भरोसा नहीं कर रहे हैं और उनकी समझ में आ गया है कि अमरीका, सऊदी अरब को केवल दूहना चाहता है।

 

टीकाकार इस अहम बिंदु की तरफ़ भी इशारा करते हैं कि सऊदी अरब की स्थिति वास्तव में अमरीका की स्थिति का आईना है और सऊदी अरब के सबसे बड़े समर्थक यानी अमरीका की सबसे पड़ी पराजय की सूचक है। ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगा कर उसे घुटने टेकने पर विवश करने और उसे संसार में अलग-थलग करने में अमरीका की विफलता के बाद सऊदी अरब, ईरान के साथ शांति चाहता है। वास्तविकता यह है कि ईरान के मुक़ाबले में अमरीका की पराजय का मतलब उसके मोहरे सऊदी अरब की भी पराजय है।