पहली तसवीर तो यह है कि बिन सलमान इस इंटरव्यू में क्राउन प्रिंस नहीं बल्कि देश के असली शासक के रूप में बोलते दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने पिता शाह सलमान का नाम बस दो चार ही बार लिया। बिन सलमान ने कहा कि पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या की ज़िम्मेदारी वह स्वीकार करते हैं क्योंकि यह हत्या उनके शासन काल में हुई और वह देश के संचालन की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं और उनके शासन में 30 लाख कर्मचारी काम करते हैं।
दूसरी तसवीर यह नज़र आएगी कि बिन सलमान इस इंटरव्यू में ईरान से संधि की अपनी इच्छा ज़ाहिर कर रहे हैं। यह बिंदु उनके पिछले लगभग सभी इंटरव्यूज़ से अलग है जिसमें वह ईरान पर तेज़ प्रहार की कोशिश करते नज़र आते थे।
तीसरी तसवीर यह नज़र आती है कि प्रिंस बिन सलमान जिन्होंने यमन पर इसलिए हमला शुरू कर दिया था कि वह मंसूर हादी को दोबारा सत्ता में पहुंचाना चाहते थे, इस दफ़ा यमन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान के हर प्रस्ताव पर सोचने के लिए तैयार हैं और राजनैतिक समाधान को सैनिक कार्यवाहियों पर प्राथमिकता देते हैं।
सऊदी अरब की नीतियों में इस बदलाव और शांतिपूर्ण समाधान की ओर झुकाव का सबसे बड़ा कारण अमरीका से मिलने वाला धोखा है जिसका एहसास इस समय सऊदी अरब को बड़ी शिद्दत से हो रहा है। सऊदी अरब को महसूस हो रहा है कि अमरीका के साथ ही अन्य पश्चिमी देशों ने भी उसे अकेला छोड़ दिया है और अब उसे ईरान तथा उसके ताक़तवर घटकों का मुक़ाबला अकेले करना है। सऊदी अरब को बहुत तकलीफ़ है कि उसके तेल प्रतिष्ठानों पर तीन बार बहुत भीतर तक बड़े हमले हुए जिससे तेल उत्पादन आधा हो गया मगर पश्चिमी देशों ने उसकी तरफ़ से कोई इंतेक़ाम लेने की कोशिश नहीं की।
यह बात सही है कि यह इंटरव्यू, प्रसारित होने से तीन दिन पहले रिकार्ड किया गया था और उस समय तक यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने 2 हज़ार सैनिकों को क़ैदी बनाने की घोषणा नहीं की थी जिनमें बड़ी संख्या सऊदी सैनिकों की है, यह घोषणा भी नहीं हुई थी कि उसने सैकड़ों की संख्या में सऊदी अरब की सैनिक गाड़ियों की और टैंकों को ज़ब्त कर लिया है तथा लगभग 350 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा आज़ाद करा लिया है लेकिन यह तय है कि बिन सलमान को इन सारी घटनाओं की जानकारी उस समय भी थी। इसलिए कि वह रक्षा मंत्री और क्राउन प्रिंस हैं। यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन की इस विजय का असर बिन सलमान के स्वर में साफ़ नज़र आया। इसलिए उन्होंने अंसारुल्लाह ही नहीं बल्कि ईरान के साथ भी शांति की बातें कीं।
साफ़ नज़र आ रहा है कि बिन सलमान ने मध्यस्थों के लिए रास्ता खोल दिया है कि वह ईरान के साथ शांति करवा दें बल्कि शायद वो मध्यस्थों को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहे थे। यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि न्यूयार्क में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि सऊदी अरब ने उनसे अनुरोध किया है कि वह ईरान से शांति के मामले में मध्यस्थता कर दें और ठीक उसी समय इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी ने जो पिछले सप्ताह रियाज़ की यात्रा पर गए थे एलान किया कि उनसे भी सऊदी अरब ने मध्यस्थता का अनुरोध किया है।
ईरान की सरकार के प्रवक्ता अली रबीई ने भी बताया कि सऊदी अरब ने राष्ट्रपति रूहानी को विशेष रूप से ख़ुफ़िया संदेश भिजवाया कि ईरान शांति वार्ता करे मगर ईरान ने कहा कि सऊदी अरब वार्ता को गुप्त रखने की शर्त हटाए।
प्रिंस बिन सलमान को यमन युद्ध के लगभग पांच साल बाद अब यह एहसास हुआ है कि वह इस युद्ध को जीत नहीं सकते और दूसरी बात यह है कि अंसारुल्लाह आंदोलन जिसे ईरान का समर्थन हासिल है और जो इलाक़े में मौजूद ताक़तवर इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे का हिस्सा है अब रक्षात्मक मुद्रा से आक्रामक पोज़ीशन में आ चुका है। यह संगठन क्रूज़ व बैलेस्टिक मिसाइलों और ड्रोन विमानों से सऊदी अरब के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर बड़े विध्वंसक हमले कर रहा है। जबकि इस बीच सऊदी अरब की हालत यह है कि उसकी वायु रक्षा व्यवस्था और ज़मीनी रक्षा पंक्तियां सब ध्वस्त हो चुकी हैं। दक्षिणी सऊदी अरब के लगभग सारे एयरपोर्ट इसलिए बेकार हो चुके हैं कि उनकी रक्षा के लिए लगाए गए अमरीकी वायु रक्षा सिस्टम नाकारा साबित हुए हैं।
सऊदी क्राउन प्रिंस ने जितनी भी उम्मीदें अमरीका और इस्राईल से लगा रखी थीं कि वह ईरान पर हमला करेंगे उन सब पर पानी फिर गया। यह भी साबित हो गया कि ट्रम्प प्रशासन ने सऊदी अरब के सामने ईरान की बेहद भयानक तसवीर केवल इसलिए पेश की थी कि सऊदी अरब को जमकर ब्लैक मेल कर सके।
यमन युद्ध का सबसे भयानक नतीजा यह रहा कि इससे सऊदी सरकार का सारा दबदबा ध्वस्त होकर रह गया। अरब व इस्लामी जनमत के निकट सऊदी सरकार आज भयानक युद्ध अपराध करने वाली सरकार के रूप में देखी जाती है। इससे पहले कभी सऊदी अरब को युद्ध रुकवाने वाले मज़बूत मध्यस्थ के रूप में देखा जाता था।
अगर सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की ओर से शांति और वार्ता का यह प्रस्ताव सच्ची नीयत के साथ है और वह अपनी नीतियों पर वाक़ई पुनरविचार करने के लिए तैयार हैं तब तो ईरान और अंसारुल्लाह की ओर से इसका सार्थक जवाब दिया जाना चाहिए ताकि और अधिक ख़ून न बहे तथा जानी व माली नुक़सान को रोका जा सके और सऊदी अरब को उस भयानक जाल से निकलने का मौक़ा मिले जिसमें उसे इस्राईल और अमरीका ने बुरी तरह फंसा दिया है।
साभार रायुल यौम