आश्चर्य न होने की कई वजहें हैं। एक वजह यह है कि यहया अस्सरीअ ने रायुल यौम अख़बार से उस दौरान संपर्क किया था जब आरामको के तेल प्रतिष्ठानों पर हमले हुए थे और उस समय कहा था कि एक बड़े सैनिक आप्रेशन की तैयारी तीन महीने से चल रही है, बाद में इसका औपचारिक एलान किया जाएगा।
यह लेख लिखे जाने तक सऊदी अरब के सैनिक प्रवक्ता तुर्की अलमालेकी ने दक्षिणी सऊदी अरब के नजरान इलाक़े में होने वाली इस कार्यवाही पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन ब्लूमबर्ग मैगज़ीन में सऊदी अरब के गुप्त सूत्रों के हवाले से जो रिपोर्ट आई है और जिसमें कहा गया है कि सऊदी सरकार यमन में आंशिक रूप से संघर्ष विराम स्वीकार करने पर विचार कर रही है उससे यही लगता है कि सऊदी अरब की समझ में अब यह बात आई है कि भारी नुक़सान से बचने के लिए यमन युद्ध को रोक देना ही बेहतर होगा। क्योंकि इस युद्ध से सऊदी अरब को भारी जानी और माली नुक़सान उठाना पड़ रहा है।
यमन युद्ध में यमनी सेना और स्वयंसेवी बलों का पलड़ा लगातार भारी होता जा रहा है। खास तौर पर हालिया कुछ महीनों में तो यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर बड़े सटीक हमले करके युद्ध का नक़्शा ही बदल दिया है। बक़ैक़ और ख़रैस वाले हमले ने तो सऊदी अरब के तेल उत्पादन में पांच मिलियन बैरल की कमी कर दी।
यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने एकतरफ़ा तौर पर संघर्ष विराम की घोषणा कर दी थी ताकि सऊदी नेतृत्व को भी युद्ध से पीछे हटने का मौक़ा मिल जाए और युद्ध पूरी तरह समाप्त करने की वार्ता की शुरुआत हो सके। कहा जाता है कि इमारात को भी अंसारुल्लाह ने इसी तरह पीछे हटने का रास्ता दिया। मगर सऊदी अरब ने यमन के इस क़दम पर कोई सार्थक जवाबी क़दम नहीं उठाया।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमारान ख़ान जब संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भाषण देने के लिए न्यूयार्क में थे तो उन्होंने बताया कि सऊदी नेतृत्व ने उनसे अनुरोध किया कि यमन युद्ध सहित कई मुद्दों के बारे में वह ईरान और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थता कर दें। उन्होंने बताया कि इस बारे में उन्होंने ईरान से कई संपर्क किए।
यह बात तय है कि यमन की सेना के प्रवक्ता यहया अस्सरीअ ने जिन जानकारियों की घोषणा की है उससे यमन युद्ध को रोकने और राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता साफ़ होगा क्योंकि यह बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि यमन में सऊदी अरब ने जो युद्ध शुरू किया है उसे वह हरगिज़ जीत नहीं पाएगा।
अंसारुल्लाह आंदोलन ने शानदार प्रतिरोध किया और युद्ध के समीकरण बदल दिए। जब अंसारुल्लाह ने सऊदी अरब के भीतर हमले कर दिए और बेहद संवेदनशील प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर सऊदी अरब की आर्थिक शहरग को दबा दिया तो अब इस युद्ध में उसका पलड़ा भारी हो चुका है।
यमन युद्ध अपनी समाप्ति के क़रीब पहुंच चुका है। अब यमन और सऊदी अरब के बीच अगर ख़ुफ़िया वार्ता शुरू हो जाती है तो हमें ताज्जुब नहीं होगा। यह वार्ता संघर्ष विराम, सऊदी हमलों से यमन को होने वाले नुक़सान के हर्जाने तथा भविष्य में अंसारुल्लाह और सऊदी अरब के संबंधों के प्रारूप के बारे में हो सकती है। बाक़ी ईश्वर बेहतर जाने!