23 सितंबर 2019 - 17:54
सऊदी अरब के लिए ट्रम्प का सुझाव है कि ईरान से जंग करो हम साथ देंगे! क्या कुछ सौ सैनिक भेजकर वाक़ई अमरीका सऊदी अरब की रक्षा करना

अरब जगत के प्रख्यात टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः सऊदी अरब के बक़ैक़ और ख़ुरैस में स्थित आरामको तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन हमलों के बाद अमरीका ने कुछ सौ सैनिक सऊदी अरब भेजने का एलान किया तो इससे सऊदी अरब में भारी निराशा फैल गई।

अमरीका के रक्षा मंत्री मार्क इस्पर ने कहा कि सऊदी अरब और इमारात ने वायु व मिसाइल रक्षा क्षमता मज़बूत करने की मांग रखी थी जिस पर इन सैनिकों को भेजने का फ़ैसला किया गया। इससे इस ख़बर की पुष्टि भी हो जाती है कि ट्रम्प ने सऊदी अरब के अधिकारियों को संदेश भेजा था कि आप लोग युद्ध शुरू कीजिए हम आपकी मदद करेंगे, आपकी रक्षा की ज़िम्मेदारी नहीं लेते और जो मदद करेंगे उसकी पूरी क़ीमत पहले ही वसूल कर लेंगे।

अमरीका के इस स्टैंड से सऊदी अरब और इमारात की हताशा अब और बढ़ेगी। सऊदी अरब को यह आशा नहीं थी कि इतना बड़ा हमला हो जाने के बाद अमरीका केवल कुछ सौ सैनिक भेजेगा बल्कि वह चाहता था कि इस हमले के बाद अमरीका ईरान के तेल व परमाणु प्रतिष्ठानों पर टूट पड़ता! मगर सऊदी नेतृत्व की कामना अलग है और ट्रम्प जो चाहते हैं वह पूरी तरह अलग है।

जब ट्रम्प यह कह रहे हैं कि सऊदी अरब युद्ध करे हम उसकी मदद करेंगे तो इसका मतलब साफ़ है कि जवाबी हमला खुद सऊदी अरब को करना है और इस युद्ध के जो भयानक परिणाम होंगे उनका सामना भी सऊदी अरब को अकेले करना होगा।

हालिया दिनों में सऊदी अधिकारियों ने यह धारणा फैलाने की कोशिश की कि जो हमला हुआ है वह केवल सऊदी अरब के लिए घातक नहीं है बल्कि इससे पूरी दुनिया के वित्तीय सिस्टम और ऊर्जा तंत्र को निशाना बनाया गया है अतः इस पर जवाब केवल सऊदी अरब को नहीं बल्कि पूरी दुनिया को मिलकर देना चाहिए।

आरामको कंपनी के प्रतिष्ठानों पर होने वाले हमलों को ध्यान से देखा जाए तो दो बातें बिल्कुल साफ़ नज़र आती हैं।

एक तो यह है कि अमरीका का पूरा रक्षा सिस्टम, जिसमें पैट्रियट मिसाइल और आधुनिक राडार भी शामिल हैं, नाकारा साबित हुआ है। इसका इज़हार रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने सऊदी अरब के सामने यह पेशकश करके कर दिया कि वह अमरीका के बजाए अब रूस से हथियार ख़रीदना शुरू कर दे।

दूसरी बात यह है कि अमरीका ने सऊदी अरब के सैनिकों, जनरलों और टेक्नीशियनों के प्रशिक्षण के लिए जो व्यवस्था कर रखी है वह भी पूरी तरह फ़ेल साबित हुई है। सऊदी जनरल और सत्ताधारी परिवार के जवान इन संस्थाओं से प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं मगर वह इस समय बेबस नज़र आ रहे हैं।

सऊदी अरब के वायु रक्षा सिस्टमों की निगरानी के लिए कुछ सौ अमरीकी सैनिकों को भेजने का फ़ैसला इन दोनों नाकामियों पर किसी हद तक पर्दा डालने की कोशिश है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि सऊदी अरब की पूरी सामरिक व्यवस्था और सैनिक संस्थान इतना कमज़ोर है कि वह अपने देश की रक्षा नहीं कर सकता यहां तक कि उसे अमरीकी वायु रक्षा सिस्टम को आपरेट करना भी नहीं आता।

हम इस संभावना से इंकार नहीं कर सकते कि शायद अमरीका सऊदी अरब और इमारात को ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में ढकेलने की योजना बना रहा है जिस तरह उसने वर्ष 1980 में सद्दाम हुसैन के साथ किया था। इस तरह यह दोनों देश कमज़ोर होंगे और उनका विदेशी मुद्रा का भंडार हड़पना अमरीका के लिए आसान हो जाएगा।

अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाने की रणनीति अपनाई है तो इससे कोई नतीजा हासिल होने वाला नहीं है।

इस समय इलाक़े में सामरिक समीकरणों के स्तर पर एक बहुत बड़ा बदलाव आधुनिक हथियार निर्माण क्रांति के रूप में आ रहा है। इस समय ईरान और उसके घटक छोटे और सस्ते हथियार तैयार कर रहे हैं जो बेहद महंगी अमरीकी और पश्चिमी रक्षा टेक्नालोजी को नाकाम बना दे रहे हैं। इसके नतीजे में ट्रम्प प्रशासन ने ईरान ही नहीं रूस, चीन, सीरिया, इराक़ वेनेज़ोएला और यमन के ख़िलाफ़ जो आर्थिक आतंकवाद शुरू किया है वह भी बेअसर होता जा रहा है।

ईरान की क्रांति संरक्षक फ़ोर्स आईआरजीसी के कमांडर इनचीफ़ जनरल हुसैन सलामी ने शनिवार को अमरीका को धमकी दी थी कि यदि ईरान पर कोई भी हमला हुआ तो वह सीमित नहीं रहेगा और जिस देश से हमला होगा वही जंग का मैदान बनेगा, हम इस बात की अनुमति नहीं देगे कि जंग का मैदान हमारा देश बने। इस धमकी का साफ़ मतलब यह है कि ईरान का जवाबी हमला अरब देशों और इस्राईल के भीतर तेल प्रतिष्ठानों, सैन्य छावनियों और अमरीकी हितों पर होगा, आरामको कंपनी पर हमला तो केवल छोटा सा उदाहरण है।

पश्चिमी देशों की नई रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि जिन सात क्रूज़ मिसाइलों और 18 ड्रोन विमानों ने आरामको के तेल प्रतिष्ठानों पर हमला किया वह अमरीकी राडारों से बचने के लिए 90 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए अपने निशाने पर पहुंचे थे अतः उन्हें बीच में रोका नहीं जा सका। यानी इसका मतलब है कि दूसरा पक्ष अमरीकी तकनीक को शिकस्त देने की पूरी क्षमता रखता है।

ट्रम्प इस समय गंभीर संकट में हैं। ईरान के साथ जो संकट उन्होंने शुरू किया उससे साबित हो गया कि वह काग़ज़ के शेर नहीं काग़ज़ के ख़रगोश हैं। वह न तो ईरान को झुका सके न वेनेज़ोएला का कुछ बिगाड़ सके। ईरान ने अमरीका का ड्रोन मार गिराया तब भी कुछ करने की उन्हें हिम्मत नहीं हुई। ब्रिटेन का तेल टैंकर ईरान ने पकड़ा तब भी वह कुछ नहीं कर पाए, सऊदी अरब और इमारात को बचाने में भी वह नाकाम रहे। उनके बस में बस इतना ही है कि ईरान पर प्रतिबंध लगाते जाएं यह अलग बात है कि प्रतिबंध भी लगातार नाकाम हो रहे हैं।

जब एक छोटे से ड्रोन विमान के कारण दुबई अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर विमानों की आवाजाही ठप्प पड़ जाती है तो यह साफ़ इशारा है कि इमारात को चेतावनी देने वाला यमन का अंसारुल्लाह आंदोलन पूरी तरह गंभीर है और आने वाले दिनों में चौंका देने वाली घटनाएं हो सकती हैं।

ट्रम्प की मूर्खता, ग़लत आंकलन और क्षेत्र के बारे में अज्ञानता इसी तरह आनन फ़ानन में चीन के ख़िलाफ़ आर्थिक युद्ध और जवाब में चीन की तरफ़ से डालर के खिलाफ़ लड़ाई तथा ईरान में 400 अरब डालर के निवेश की चीनी घोषणा यह सारी चीज़ें अमरीकी वर्चस्व के दौर के पतन की निशानियां हैं।