3 सितंबर 2019 - 18:15
 अज़ादारी क्यों मनाई जाती है? क़ुरआन पर अमल करने का नाम अज़ादारी है, अज़ादारी इबादत है न कि रस्म

पवित्र क़ुरआन अच्छे और बुरे लोगों की कहानियों से भरा पड़ा है। यही नहीं इन्हें बार-बार पढ़ने पर बल दिया गया है। क़ुरआन को पढ़ने, सुनने और यहां तक कि क़ुरआन को देखना भी इबादत है। दूसरे शब्दों में यूं कहूं कि जो घटनाएं शिक्षाप्रद हैं उनसे इंसानों और इंसानियत को पाठ मिलता है उन्हें दोहराना इबादत है।

मोहर्रम में उन महान हस्तियों के बलिदान को याद किया जाता है जिन्होंने इंसानों की भलाई और कल्याण के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया। दूसरे शब्दों में मोहर्रम वह महीना है जिसमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों ने क़ुर्बानियां देकर ईश्वरीय आदेशों को बचा लिया। अज़ादारी में क्या होता है? यही तो होता है कि ईश्वरीय आदेशों को बचाने के लिए इमाम हुसैन अलैहिसस्लाम और उनके वफ़ादार साथियों ने जो क़ुर्बानियां दीं उसे बयान किया जाता है।

क़ुरआन को बार-बार पढ़ने पर बल दिया गया है क्यों, ताकि अच्छे और बुरे लोगों का अंजाम याद आता रहे। अगर क़ुरआन की शिक्षाओं को याद करने और उसमें चिंतन मनन करने के लिए क़ुरआन को बार-बार पढ़ा जाए तो सवाब है और जो भी इंसान एसा करे तो उसे क़ुरआन पर अमल करने वाला इंसान कहा जाएगा तो जिस हस्ती ने क़ुरआन को ही बचाया है उसकी याद मनाना कैसा है? अज़ादारी कोई रस्म नहीं बल्कि इबादत है। अज़ादारी में हम हक़ और सच को बचाने के लिए कुरआने नातिक़ अर्थात बोलते हुए क़ुरआन द्वारा दी गयी क़ुर्बानियों को याद करते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने नाना और बाबा की उम्मत की भलाई और उसके सुधार के लिए महाआंदोलन किया था। अज़ादारी में जाने वाले हर इंसान का उद्देश्य सुधार होना चाहिए। अगर किसी इंसान के अंदर सुधार और दूसरों की भलाई की भावना ही न हो तो उसने न तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को समझा और न ही उनकी महान क़ुर्बानियों के मक़सद को समझा।

मोहर्रम वह महीना है जिसमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों के पावन लहू ने यज़ीद की राक्षसी सेना की तलवारों पर ऐसी एतिहासिक विजय प्राप्त की जिसे कभी भी नहीं भुलाया जा सकेगा यद्यपि इसे भुलाने या मूल चीज़ से दिमाग को भटकाने के लिए बड़े-बड़े प्रयास किए गए और किए जा रहे हैं। बहुत से लोग यह चाहते हैं कि लोगों को सच्चाई का ही पता न चले इसके लिए विभिन्न प्रकार की बातें करते हैं।

कुछ तथाकथित मुफ़्ती यह फ़तवा देते हैं कि मजलिस में जाना हराम अर्थात वर्जित है, तबर्रुक का खाना हराम है मगर अफ़सोस कोई इन दरबारी मुफ़्तियों से यह नहीं पूछता कि ट्रम्प के साथ तलवार लेकर नाचना कैसा है? ट्रम्प और उनकी मंडली के साथ खाना-खाना कैसा है? ट्रम्प की बीवी का हाथ चूमना कैसा है? इस मोहर्रम की आवाज़ को दबाने के लिए सिरतोड़ कोशिश की जा रही है मगर इतिहास और क़ुरआन गवाह है कि बातिल कभी भी अपने शैतानी लक्ष्यों में कामयाब नहीं हो सका है। फ़िरऔन और हज़रत मूसा की कहानी को देख लीजिए। फ़िरऔन की ताक़त के मुकाबले में हज़रत मूसा की ज़ाहिरी ताक़त क्या थी? मगर फिरऔन का अंजाम देखिए। नमरूद और हज़रत इब्राहीम की मिसाल ले लीजिए। नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को आग में डलवा दिया मगर अंजाम क्या हुआ। हज़रत इब्राहीम विजयी रहे।

आज बहुत से लोग नमरूद का नाम तक नहीं जानते। कोई अपना नाम नमरूद या फिरऔन रखना पसंद नहीं करता लेकिन इस दुनिया में हज़ारों लोग मिल जाएंगे जो अपना नाम मूसा और इब्राहीम रखते हैं। यही नहीं जो लोग परोक्ष रूप से यज़ीद का समर्थन करते हैं वे भी अपना या अपने बच्चों का नाम यज़ीद नहीं रखते। उनका नाम न रखना यह बता रहा है कि उन्हें सच्चाई पता है। कुछ लोग बहुत ही प्यारे अंदाज़ से अहलेबैत अलैहेमुस्लाम पर ज़ुल्म करने वालों का बचाव करते और कहते हैं कि किसी को बुरा-भला न कहो, क्योंकि हर हंसान का अमल उसके साथ है तो मुक़द्दस लोगों का चोला धारण करने वालों से मैं यह कहना चाहता हूं कि यह सुझाव तो उन्हें ईश्वर को देना चाहिए क्योंकि ईश्वर ने झूठ बोलने वालों पर लानत की है, शैतान पर लानत की है। ज़ालिमों पर लानत की है। इसमें हर ज़ालिम शामिल है क्योंकि उसमें समय व स्थान की कोई क़ैद नहीं है। क़ुरआन में ग़लत और ग़लत काम करने वालों को बुरा-भला कहा गया है।

मेरे विचार में तो जो इंसान ग़लत को ग़लत न कहे और ग़लत पर लानत न करे और उससे स्वयं को दूर न करे वह सच्चा मुसलमान व इंसान ही नहीं है। क़ुरआन झूठों पर लानत भेज रहा है यानी बता रहा है कि झूठों पर लानत भेजो और जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्राणप्रिय नाती और उनके वफ़ादार साथियों को भूखा- प्यासा शहीद कर दे तो उसे बुरा-भला ही न कहा जाए। जो भी इस तरह की बात करता है संभव है कि उसे क़ुरआन की आयतें व सूरे याद हों मगर वह क़ुरआन पर अमल नहीं कर रहा है। न केवल यह कि वह क़ुरआन के कहे का पालन नहीं कर रहा है बल्कि दूसरों को भी क़ुरआन का पालन करने से रोक रहा है।

बहरहाल क़ुरआन पर अमल करने का नाम अज़ादारी है। अज़ादारी का महत्व इतना ज़्यादा है कि उसे न तो कोई बयान कर सकता है और न ही समझ सकता है बस इतना कहूंगा कि अज़ादारी उस महान हस्ती की क़ुर्बानियों को याद करने का मौक़ा है जिसने इस्लाम को सर्वकालिक जीवन प्रदान करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

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