ट्रम्प सरकार के प्रभावी दक्षिणपंथी सदस्य, जो पूरी तरह से नेतनयाहू के नेतृत्व में ज़ायोनी दक्षिणपंथियों के प्रभाव में हैं, फ़ार्स की खाड़ी में अपने दृष्टिगत समुद्री गठजोड़ का गठन करने में सफल नहीं हो पाएं हैं बल्कि उन्होंने अबू धाबी और रियाज़ में व्यवहारिक रूप से सत्ता अपने हाथ में लेने वाले राजकुमारों की सम्मिलिति से जो गठजोड़ बनाया था वह भी धराशायी होने की कगार पर है।
ताज़ा घटनाक्रम में अबू धाबी ने संयुक्त अरब इमारात की अन्य सलतनतों के प्रमुखों के आग्रह पर, जिन्हें यमन युद्ध में अबू धाबी की सम्मिलिति या ईरान से टकराव के नकारात्मक परिणामों का अच्छी तरह आभास हो गया है, अपने रुख़ में बुनियादी परिवर्तन कर लिया है और यह परिवर्तन सऊदी अरब की मर्ज़ी से हुआ है तो इस स्थिति में कहा जा सकता है कि "बी टीम" के नाम से कुख्यात इस गुट के दो क्षेत्रीय स्तंभ व्यवहारिक रूप से गिर गए हैं। इस गुट ने डील आफ़ द सेंचुरी नामक चाल को लागू करने को अपना मुख्य एजेंडा बना रखा था और इसके अंतर्गत वह मध्यपूर्व के पारंपरिक नक़्शे से फ़िलिस्तीन को मिटाना और ज़ायोनी शासन के हित में नई सीमाएं बनाना चाहता था। इस डील के क्रियान्वयन के लिए इसके अरब पक्षों को कुछ प्रलोभन भी दिए गए थे जिनमें यमन के दक्षिणी भाग पर इमारात का नियंत्रण और यमन के कई अन्य क्षेत्रों पर सऊदी अरब का क़ब्ज़ा शामिल था। अब ऐसा लगता है कि इन दोनों देशों को ज़मीनी वास्तविकता का अच्छी तरह आभास हो गया है लेकिन समस्या यह है कि अगर मुहम्मद बिन सलमान और मुहम्मद बिन ज़ायद बी टीम से निकल जाते हैं तो अमरीका व ज़ायोनी शासन के दक्षिणपंथियों की सारी योजनाएं फ़ेल हो जाएंगी।