18 जुलाई 2019 - 14:00
क्या वजह है कि ईरान, अमरीका जैसी ताक़त के सामने खड़ा हो सका? बताया कुवैत के समीक्षक ने

कुवैत से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र " अर्राय" ने अपने एक आलेख में उन कारणों का जायज़ा लिया है जिनकी वजह से ईरान, अमरीका जैसी बड़ी शक्ति के सामने डट जाने में सफल हुआ है।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने  ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान " कर्बला हम आ रहे हैं" का नारा लगाया और आगे बढ़ा फिर हालिया दिनों में उसने सीरिया संकट के समय यह नारा लगाया कि " ज़ैनब को दोबारा बंदी नहीं बनने देंगे।" यह नारा सीरिया में युद्ध और बलिदान के लिए युवाओं को तैयार करने के लिए लगाया गया था। इन सब नारों का समय खत्म हुआ और अब ईरान ने अपने राष्ट्र और अपने देश वासियों  के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का नारा लगाया है क्योंकि अमरीका ने जिस प्रकार से ईरान पर प्रतिबंध लगाए हैं उससे निश्चित रूप से ईरानी जनता को निशाना बनाया जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि ईरान में वह शक्ति कहां से आयी जिसके बल पर वह अमरीकी जैसी महाशक्ति की आंखों में आंखे डाल कर उसकी बात मानने से इन्कार कर देता है?

     ईरान टैंक, मिसाइल, युद्धक विमान और पनडुब्बी बनाता है और परमाणु क्लब में भी  शामिल हो चुका है। इसके साथ ही  ईरान लेबनान, सीरिया, यमन, इराक़, फिलिस्तीन और अफगानिस्तान में एसे मित्र और घटक  हैं जो किसी भी दशा में उसका साथ नहीं छोड़ेंगे इस लिए ईरान आगामी किसी भी युद्ध में उनपर पूरा भरोसा कर सकता है। इसके साथ ही ईरान में एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था है और हर चार साल में मतदान द्वारा राष्ट्रपति बदल जाता है और एक व्यक्ति केवल दो बार ही निरंतर राष्ट्रपति बन सकता है जबकि अरब देशों में इसके विपरीत है और वहां यह पद अजीवन होता है। ईरान की संसद में अल्पसंख्यकों की आरक्षित सीटें हैं जिनमें यहूदी तक शामिल हैं जिनके पूरे ईरान में 25 उपासना स्थल हैं। ईरान में बारह से पंद्रह हज़ार यहूदी रहते हैं और उनके सांसद का नाम सियामक मूरी है।

     ईरान, गत 40 वर्षों से अमरीका के सामने डट कर उसके प्रतिबंधों को चुनौती दे रहा है। ईरान ने अमरीका का अत्याधुनिक ड्रोन विमान मार गिरा कर यह संदेश दिया कि उसे युद्ध से डर नहीं लगता और वह लड़ाई के लिए तैयार है अगर यह उसकी सीमाओं की रक्षा और अतिक्रमण रोकने के लिए ज़रुरी हुआ तो। इस तरह से उसने अमरीका और इस्राईल को यह बता दिया कि वह अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार है।

     अमरीका को अच्छी तरह से मालूम है कि ईरान को भीतरी आंदोलनों से डर नहीं लगता क्योंकि ईरान की सरकार जनता द्वारा निर्वाचित है इसी तरह वाशिंग्टन को यह भी मालूम है कि अगर युद्ध हुआ तो ईरान इस युद्ध में अपने सभी घटकों को प्रयोग करेगा और स्वंय भी मैदान में कूद पड़ेगा और इस दिन के लिए उससे जितना हो सका है उतनी उसने तैयारी की है ताकि दुश्मन के मन में डर बिठाया जाए। इस लिए आज जो कुछ ईरान कर रहा है उससे क्षेत्र में किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ईरान में जनतंत्र है। हर देश का अधिकार है कि वह कठिन समय में अपने घटकों का सहयोग ले। यह भी स्वाभाविक अधिकार है कि यदि किसी देश की सीमा पर अतिक्रण किया जाए तो वह उसका जवाब दे। सब से बड़ी बात तो यह है कि अमरीका के भयानक दबाव के बावजूद ईरान के भीतर से " व्यवस्था में बदलाव" की आवाज़ नहीं सुनायी दे रही है।

     आजकल तो हमें आईआरजीसी के कमांडरों की ज़बान से धर्म आदि की बात भी नहीं सुनायी दे रही है क्योंकि विभिन्न धर्मों और जातियों से संबंध रखने वाले ईरानी नागरिक, अपने नेता के साथ खड़े हैं। इन हालात में युरोप द्वारा ईरान व अमरीका के बीच मध्यस्थता की कोशिश नाकाम हो जाएगी क्योंकि युरोप में इतनी ताक़त ही नहीं है कि वह ट्रम्प जैसे व्यक्ति पर दबाव डाल सके और जहां तक ईरान का संबंध है तो वह किसी भी दशा में अपने घटकों को अकेला नहीं छोड़ेगा क्योंकि उसने कठिन समय में हमेशा अपने घटकों का साथ दिया है। इसी  तरह से ईरान अपनी मिसाइल शक्ति से भी पीछे हटने वाला नहीं है क्योंकि उसकी सभी उपलब्धियों की  सुरक्षा करने का यही  एक मज़बूत व प्रभावशाली साधन उसके पास है और आज वह इसी मिसाइल शक्ति के बल पर युद्ध के लिए तैयार है।

अंत में और एक अहम कारण यह है कि ईरान ने फिलिस्तीनी मुद्दे को कभी नहीं छोड़ा और हर उस चीज़ से इन्कार किया जिससे फिलिस्तीनियों ने इन्कार किया और फिलिस्तीनियों की ही तरह ईरान ने भी डालर के बदले फिलिस्तीन की सौदेबाज़ी का कड़ा विरोध किया जबकि क्षेत्रीय देशों ने अमरीकी राष्ट्रपति का दामाद होने की वजह से एक बचकानी योजना को लपक लिया जिन्हें यह गलतफहमी हो गयी है कि वह फिलिस्तीन के उस मुद्दे का समाधान खोज लेंगे जिसके समाधान में बड़े बड़े राजनेता और कूटनयिक विफल रहे हैं। ईरान ने इस डील का कड़ा विरोध किया। ईरान के साथ ही इराक़, कुवैत, लेबनान और सभी फिलिस्तीनियों ने इसका विरोध किया। ईरान को पता है कि ट्रम्प तर्क व दलील वाले व्यक्ति नहीं हैं बल्कि वह केवल ताक़त की भाषा समझते हैं और वह भाषा ईरान को बहुत अच्छी तरह से आती है।