4 जून 2019 - 19:15
अल-साहवा अल-इस्लामिया क्या है? इसी जुर्म में 3 सऊदी सुन्नी विद्वानों को रमज़ान के बाद फांसी दी जाने वाली है

साहवा अल-इस्लामिया या इस्लामी जागृति या साहवा, 1960 और 1980 के दशकों में सऊदी अरब में शक्तिशाली सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का काल था।

1990 के दशक से इस देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोधियों के दमन की शुरूआत के बावजूद, मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा से प्रेरित इस धार्मिक आंदोलन का आज भी सऊदी समाज पर दबदबा बाक़ी है।

हालांकि यह आंदोलन अहिंसा पर बल देता है और धर्म एवं राजनीति के बीच संबंध को स्वीकार करता है।

साहवा से संबंधित कई हस्तियों ने राजनीति में अहम भूमिका निभाने के साथ देश में आले सऊद परिवार के एकाधिकार को चुनौती दी।

साहवा की छत्रछाया में आने वाले विभिन्न गुटों की विचारधाराओं में अंतर रहा है, लेकिन कुल मिलाकर इनकी विचारधारा प्रगतिशील रही है। उदाहरण स्वरूप, वहाबी विचारधारा की तुलना में यह लोग महिला अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता पर बल देते हैं।

मोटे तौर पर यह आंदोलन शिक्षा और आम ज़िंदगी में इस्लामी शिक्षाओं की व्यापक भूमिका की वकालत करता है।

हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साहवा से जुड़े सुन्नी धर्मगुरुओं, विद्वानों और पत्रकारों समेत अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए एक अभियान शुरू किया है।

इस अभियान के तहत वरिष्ठ शिया मुस्लिम धर्मगुरू शेख़ निम्र समेत सैकड़ों लोगों के सिर क़लम कर दिए गए या उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया।

इस विचारधारा से जुड़े तीन प्रसिद्ध नाम ऐसे हैं, जिन्हें अगले कुछ दिनों में सऊदी अरब में फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया जाएगा।

रमज़ान के बाद सुन्नी मुस्लिम विद्वान सलमान अल-अवदाह, अवद अल-क़रनी और अली अल-ओमरी के सिर क़लम कर दिए जाने की संभावना है