यह मुसलमानों के तीन बड़े त्योहार में से एक है जिसे न सिर्फ़ इस्लामी देशों बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में रहने वाले मुसलमान भी मनाते हैं। विभिन्न मुस्लिम देश व राष्ट्र अलग अलग तरीक़े से ईद का त्योहार मनाते हैं लेकिन उन सबके बीच एक बात समान है और वह है ईदुल फ़ित्र की नमाज़ का आयोजन। भारत में ईद के दिन नमाज़ के बाद लोग गले मिलते हैं, निर्धनों व वंचितों को विशेष दान देते हैं जिसे ज़काते फ़ितरा कहते हैं। इस दिन बच्चे बड़ों से गले मिल कर उनसे ईदी लेते हैं। घर घर में नाना प्रकार की सेवइयां बनती हैं जिसे खाने का आनंद ही कुछ और है। ईद के दिन मुसलमान नये कपड़े पहनते हैं। शव्वाल महीने का पहला दिन ईदुल फ़ित्र कहलता है। ज़्यादातर इस्लामी देशों में ईद के दिन सरकारी छुट्टी होती है। इस दिन रोज़ा रखना वर्जित और फ़ितरा नामक धार्मिक कर देना अनिवार्य है।
ईदुल फ़ित्र मुसलमानों की दूसरी ईदों से थोड़ा भिन्न है। यद्यपि ईदुल फ़ित्र अन्य ईदों की तरह ख़ुशी का दिन है लेकिन इस दिन लोग नमाज़ और प्रार्थना के साथ ख़ुशियां मनाना शुरू करते और मनोरंजन के भद्दे व वर्जित तरीक़ों से दूर रहते हैं। यह ईश्वर पर आस्था रखने वालों की विशेषता है जिनके बारे में ईश्वर पवित्र क़ुरआन के क़सस नामक सूरे की आयत नंबर 55 में फ़रमाता हैः "जब भी उनके कानों में बकवास व निरर्थक बात पड़ती है तो उससे दूरी अख़्तियार करते हैं।"
इस्लामी संस्कृति में ईश्वर पर आस्था रखने वाले मोमिन बंदों के जीवन की हर गतिविधी का सार्थक लक्ष्य होता है, यही वजह है कि मोमिन बंदे उन कर्मों व निरर्थक विचारों से दूर रहते हैं जो उन्हें ईश्वर की याद से दूर कर सकते हैं। वे ईदुल फ़ित्र जैसे दिनों में इस संबंध में अधिक प्रयास करते हैं। रवायत में है कि पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने ईदुल फ़ित्र के दिन कुछ लोगों को घटिया मनोरंजन में डूबा हुआ देखा। आपने जब यह दृष्य देखा तो अपने साथियों से फ़रमायाः "जान लो कि ईश्वर ने पवित्र रमजान के महीने को अपने बंदों के लिए प्रतियोगिता का दिन क़रार दिया है कि जिसमें बंदे उसके आदेश का पालन और उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। तो एक गुट ने प्रतिस्पर्धा की, आगे निकला और मुक्ति पा गया जबकि दूसरे गुट ने अवज्ञा की और वह प्रतियोगिता में हार गया। उन लोगों पर बहुत हैरत होती है कि वे उस दिन जिस दिन सदाचारियों को उपहार मिलता है, नुक़सान उठाएं और बुरे व निरर्थक खेल में डूबे रहें।
इस दिन ईश्वर के सदाचारी बंदे आशा भरे मन के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के परपौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की आत्मज्ञान से भरपूर दुआ पढ़ते है। इस दुआ में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः "हे पालनहार! हर वह पाप से जिसे हमने अंजाम दिया, या हर उस बुराई से जिसे पहले अंजाम दे चुके हैं और उस बुरे विचार से प्रायश्चित करते हैं। ऐसे व्यक्ति का प्रायश्चित जो पाप की ओर पलटने का इरादा नहीं रखता। शुद्ध प्रायश्चित जिसमें संदेह की कोई जगह न हो। तो उसे हमसे स्वीकार कर और हमें प्रायश्चित पर बाक़ी रख।"
ईश्वर की निशानियों का सम्मान ईदुल फ़ित्र की विशेषता है। अल्लाहो अकबर, लाइलाहा इल्लल लाह, अलहम्दुलिल्लाह के नारे लगाना और ईद की भव्य नमाज़ के आयोजन के लिए नया चांद दिखने पर ईश्वर का आभार प्रकट करना, इस विशेष दिन की शोभा बढ़ाने वाले कर्म हैं।
ईद के दिन धार्मिक नारे, इस्लाम की शान, मुसलमानों की एकता व शक्ति और एकेश्वरवाद की जीवनदायक आवाज़ दुनिया वालों के कान तक पहुंचती है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने फ़रमायाः अपनी ईदों की शोभा तकबीर से बढ़ाओ। अर्थात ईद के दिन अल्लाहु अकबर कहो। पैग़म्बरे इस्लाम का एक अन्य कथन हैः ईदुल फ़ित्र और बक़रईद के दिन की शोभा ला इलाला इल्लल लाह वल्लाहु अकबर, वल्हमदुलिल्लाह व सुब्हानल्लाह के नारों से बढ़ाओ।
वरिष्ठ धर्मगुरु स्वर्गीय शैख़ मुफ़ीद लिखते हैः "शव्वाल का पहला दिन मोमिनों के लिए इसलिए ईद क़रार पाया है कि वे पवित्र रमज़ान के अपने कर्म के स्वीकृत होने पर ख़ुश हैं क्योंकि ईश्वर ने उनके पाप को माफ़ कर दिया, उनकी त्रुटियों को छिपा दिया है और उन्हें ईश्वर की ओर से यह शुभसूचना मिली है कि रोज़ा रखने वालों को बहुत अधिक पुन्य मिलेगा। आस्तिक बंदे पवित्र रमज़ान के दिन रात की कोशिशों से ईश्वर का सामिप्य पाने के कई चरण निकट हुए हैं, इसलिए ख़ुशहाल हैं। इस दिन के लिए विशेष नहान है जो पाप से पाक होने का चिन्ह है। ख़ुशबू लगाना, साफ़ व सुंदर कपड़े पहनना, खुले आसमान में नमाज़ पढ़ना ये ख़ुशी के चिन्ह हैं जिनके पीछे तत्वदर्शिता निहित है।"
वास्तव में 30 दिन के रोज़े की समाप्ति पर ईदुल फ़ित्र का त्योहार ईश्वर की ओर से ख़ुश करने वाला उपहार है जिसकी मिठास रोज़ेदार सहित सभी मुसलमान महसूस करते हैं।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः "जब ईद का चांद नज़र आता है तो फ़रिश्ते आवाज़ देते हैं कि हे मोमिन बंदे आओ अपने इनाम ले लो।" इसी तरह हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः जान लो कि रोज़ा रखने वाले मर्दों और औरतों को सबसे कम चीज़ जो मिलती है वह यह कि पवित्र रमज़ान के अंतिम दिन ईश्वर की ओर से एक फ़रिश्ता कहता हैः "हे ईश्वर के बंदो! तुम्हें यह शुभसूचना दी जाती है कि ईश्वर ने तुम्हारे अतीत के पापों को माफ़ कर दिया है। अब आगे की फ़िक्र करो कि अपना नया जीवन किस तरह बिताओगे।"
जी हां पवित्र रमज़ान की समाप्ति और ईदुल फ़ित्र के दिन इंसान नया जीवन शुरु करता है। यह इंसान रमज़ान से पहले वाले अपने वजूद से भिन्न हो चुका है। अब उसकी समझ बेहतर हुयी है। एक महीने की ट्रेनिंग से उसकी भावनाएं गहरी हो गयी हैं। वह रोज़ा रख कर दीन दुखियों के दर्द से अवगत हो गया है। उसके व्यक्तित्व में ठहराव आ गया है। उसमें धैर्य व न्याय की भावना विकसित हुयी है। यह बदला हुआ महान इंसान अपने वुजूद में गहरा बदलाव महसूस करता है। ईद की सुबह पहले ज़काते फ़ितरा नामक विशेष दान देता है।
ज़काते फ़ितरा व्यक्ति और समाज को पाक करता है, लोगों के मन में भलाई की भावना मज़बूत होती है और इससे समाज की प्रगति में भी मदद मिलती है। दूसरे शब्दों में फ़ितरा एक ओर बुराइयों को धोता है तो दूसरी ओर परिपूर्णता तक ले जाता है।
रोज़ेदार को यह बात समझ में आ गयी है कि समाज में जो बुराइयां निर्धनता, वंचित्ता और सामाजिक असमानता से आयी है, वह दान करने और ज़कात जैसे धार्मिक कर निकालने से दूर होगी, समाज बुराइयों से पाक होगा और साथ ही इस तरह के कार्यक्रम से सामाजिक एकता तथा आर्थिक विकास हासिल होगा।
पवित्र रमज़ान में दोबारा नया वजूद पाने वाला व्यक्ति सामाजिक समस्याओं और वंचित वर्ग के लोगों को उनके अधिकार दिलाने की निरंतर कोशिश करता है। वह समाज की मुश्किलों के आयाम और इन मुश्किलों में फंसे लोगों की पहचान कर, सुधार की दिशा में क़दम उठाता है। इसलिए वह ईदुल फ़ित्र के दिन जश्न मनाता है ताकि ईश्वर का आभार प्रकट करे। इसके बाद वह नया जीवन शुरु करता है जो उसके उस जीवन से अलग है जब वह अपने व्यक्तिगत हितों की प्राप्ति में खोया हुआ और अपनी आत्मा को घमन्ड के जाल में क़ैद किए हुए था।
वास्तव में ईदुल फ़ित्र मन के बुराइयों के अंधकार से मुक्ति पाने की ख़ुशी का दिन है। वह अंधकार जो संभव है इंसान के जीवन भर पाप करने की वजह से पैदा हुआ है। ईदुल फ़ित्र ईश्वरीय प्रवृत्ति की ओर पलटने और उससे पाठ लेने का दिन है।
जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः जब अपने घर से ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए निकलो तो उस समय को याद करो जब तुम्हारी आत्मा शरीर रूपी घर से निकल कर ईश्वर की ओर जाएगी। जब नमाज़ पढ़ने खड़े हो तो उस समय को याद करो जब ईश्वरीय न्याय के सामने खड़े होगे और तुमसे हिसाब किताब होगा। जब नमाज़ पढ़ने के बाद अपने घर पलटो तो उस समय को याद करो जब स्वर्ग में अपने घरों में जाओगे।
ईदुल फ़ित्र के लिए मुसलमानों की विशेष तय्यारी इस्लाम के वजूद के लिए बहुत अहमियत रखती है। ईदुल फ़ित्र की नमाज़ में एक दिन सभी मुसलमानों की उपस्थिति इस्लाम की शान और मुसलमानों के बीच एकता का जलवा पेश करती है। इसकी दूसरी विभूतियां भी हैं जिससे इस्लाम को बहुत फ़ायदा पहुंचता है। ईद की नमाज़ में इस दिन को पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा लाए गए धर्म के लिए एक प्रकार की पूंजि और उस पैग़म्बर के लिए शान का स्रोत है जिसने एक राष्ट्र को इस तरह संगठित किया कि उनके बीच एकता व अखंडता पैदा हुयी।
जैसा कि ईदुल फ़ित्र की नमाज़ की विशेष दुआ में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारे व्यक्तित्व को उन सभी इस्लामी व मानवीय मूल्यों से सुशोभित कर जिनसे तूने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को सुशोभित किया और हमें उन सभी बुराइयों दूर रख जिनसे तूने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को दूर रखा।