मगर यह तो साफ़ है कि अमरीकी प्रशासन ने आंख बंद करके इन जानकारियों पर भरोसा किया है और युद्ध की ओर आगे बढ़ रहा है।
कई प्रकार कल अटकलें हैं जिनसे यह अनुमान होता है कि इस्राईली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने ट्रम्प को एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें कहा गया है कि ईरान की पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स तथा उसके घटक संगठन इराक़ में अमरीकी सैनिकों पर हमले की तैयार कर रहे हैं। अमरीकी सैनिक इराक़ में तीस से अधिक छावनियों में मौजूद हैं। इसी वजह से अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने इराक़ की औचक यात्रा की और चार घंटे की संक्षिप्त यात्रा में उन्होंने इराक़ के राष्ट्रपति बरहम सालेह तथा प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी से मुलाक़ात की। पेम्पेयो का कहना है कि उन्होंने इराक़ी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यह आश्वासन लिया है कि इराक़ में अमरीकी हितों और सैनिकों की रक्षा की जाएगी। मगर इराक़ी अधिकारियों की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया जिसमें इस आश्वासन की पुष्टि हो या पोम्पेयो की यात्रा और उसके उद्देश्यों के बारे में कुछ बताया जाए।
हमें यह नहीं पता कि इस्राईली इंटेलीजेन्स की यह ख़ुफिया रिपोर्ट किस हद तक गंभीर है और अमरीकी प्रशासन ने कैसे इस रिपोर्ट पर विश्वास करके युद्ध की तैयारी शुरू कर दी लेकिन हमें इतना तो पता है कि ट्रम्प प्रशासन को बार बार चेतावनी दी गई है कि वह झूठी ख़बरों के झांसे में न आएं क्योंकि इस प्रकार की बहुत सी ख़बरों के पीछे उनके मित्र नेतनयाहू का हाथ होता है। हमें लगता है कि ट्रम्प को भी शायद इस्राईल द्वारा फैलाई जाने वाली झूठी खबरों को थोड़ी बहुत जानकारी है लेकिन फिर भी वह चाहते हैं कि ईरान जो दबाव और प्रतिबंधों से नहीं डर रहा है वह युद्ध से डर जाए और मजबूर होकर अमरीका की मांगें स्वीकार कर ले।
ट्रम्प इस समय अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन के जाल में फंसे हुए हैं जिन्हें ईरान के खिलाफ़ युद्ध के सबसे कट्टर समर्थकों में गिना जाता है और झूठ बोलने का उनका पुराना इतिहास है। वह इंटेलीजेन्स रिपोर्टों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने में भी महारत रखते हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में कहा था कि ईरान के परमाणु ख़तरे का मुक़ाबला करने का तरीक़ा यही है कि अमरीका के समर्थन से इस्राईल ईरान पर हमला करे और ईरान में मौजूद सरकार को बदल दे।
ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी ने बुधवार को घोषणा की कि उनका देश परमाणु समझौते के तहत स्थगित कर दी जाने वाली कुछ गतिविधियों को पुनः शुरू करेगा। ईरान ने यूरोपीय देशों को साठ दिन का समय दिया है जिसके भीतर वह ईरान पर लगे प्रतिबंधों को कम करने के लिए क़दम उठाएं वरना दूसरी स्थिति में ईरान यूरेनियम संवर्धन की पुरानी स्थिति पर पलट जाएगा। ईरान की यह रणनीति बड़ी समझदारी वाली है जो ज़ाहिर करती है कि वह सैनिक टकराव नहीं चाहता। मगर हमें संदेह है कि यूरोप इस अवधि में अपने दायित्वों पर अमल करेगा। क्योंकि उसके पास ट्रम्प सरकार पर दबाव डालने का कोई साधन नहीं है बल्कि ख़ुद यूरोपीय देशों के भीतर भी इसका इरादा नहीं पाया जाता।
युद्ध के ढोल की आवाज़ा तेज़ी होती जाएगी और आने वाले दिनों और सप्ताहों में हंमागा बढ़ेगा और हमें तो इसकी भी संभावना लगती है कि युद्ध की चिंगारी भड़काने में इस्राईली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद का हाथ हो।
हमें यह लगता है कि संभावित रूप से मोसाद मोसाद इराक़ में अमरीकी सैनिकों पर जाली हमला करवाए और हमले की ज़िम्मेदारी कोई संगठन ले जो ख़ुद को ईरान समर्थक बताए जिसके बाद ट्रम्प को युद्ध शुरू करने का मौक़ा मिल जाए! क्योंकि मोसाद का इस प्रकार की हरकतों का पुराना इतिहास है।
ईरान को पूरी तरह हक़ हासलि है कि वह अमरीकी उद्दंडता का मुक़ाबला करे वैसे भी ईरान के पास भरपूर रक्षा क्षमताएं मौजूद हैं। अमरीका सुपर पावर होकर भी इस युद्ध में भारी नुक़सान उठाएगा। क्या उदाहरण स्वरूप इराक़ में बुरी तरह नुक़सान उठाने के बाद अमरीका को पीछे नहीं हटना पड़ा था। क्या अमरीका को इस युद्ध में 7 ट्रिलियन डालर की रक़म खर्च नहीं करनी पड़ी? क्या अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध नहीं हारा और आज तालेबान से वार्ता नहीं कर रहा है? क्या सीरिया में सरकार गिराने की अमरीकी साज़िश फ़ेल नहीं हुई?।
अरब और मुस्लिम राष्ट्रों के पास अपनी रक्षा करने और दुशमन को सबक़ सिखाने का पूरा जज़्बा मौजूद है। गज़्ज़ा पट्टी में हम जो कुछ देख रहे हैं ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध होने की स्थिति में वही महान प्रतिरोध हमें देखने को मिलेगा। यह बात सब को समझ लेना चाहिए।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार