परमाणु समझौता उसी समय कमज़ोर हो गया था जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने समझौते से बाहर निकलने की घोषणा की। मई 2018 में डोनल्ड ट्रम्प ने इस समझौते से बाहर निकलने की घोषणा की हालांकि इस समझौते की बुराई वह काफ़ी पहले से कर रहे थे।
अब जब परमाणु समझौते से अमरीका के बाहर निकल जाने को एक साल का समय हो चुका है तो ईरान ने भी घोषणा कर दी कि परमाणु समझौते के तहत तेहरान जिन प्रतिबंद्धताओं का पालन कर रहा था उनमें से कुछ का पालन व छोड़ रहा है।
ईरान ने इस पूरी अवधि में यह साबित किया कि वह परमाणु समझौते पर पूरी निष्ठा से अमल कर रहा है और अंतर्राष्ट्रीय समझौते के पालन को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए ईरान एक ज़िम्मेदार राष्ट्र जैसा बर्ताव कर रहा है। लेकिन अमरीका की ट्रम्प सरकार ने इस समझौते के साथ ही कई समझौतों से बाहर निकल जाने की घोषणा कर दी। उन्होंने कुछ अतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलने का भी एलान कर दिया।
ईरान ने बहुत सधी हुई रणनीति के तहत काम किया जिसका नतीजा यह है कि सारी दुनिया यहां तक के अमरीका के यूरोपीय घटक देश भी परमाणु समझौते के लिए उत्पन्न होने वाली समस्याओं के लिए अमरीका को दोषी मान रहे हैं। यूरोपीय देशों ने परमाणु समझौते में बने रहने की बार बार घोषणा तो की लेकिन परमाणु समझौते के पालन के तहत उन्हें ईरान से सहयोग की दिशा में जो क़दम उठाने थे उन्होंने नहीं उठाए।
इस तरह देखा जाए तो ईरान की कूटनीति को सफलता मिली और विश्व स्तर पर अमरीका की छवि एक अड़ियल और क़ानूनों का हनन करने वाले देश की छवि बन गई।
अब सवाल यह पैदा होता है कि ईरान आगे क्या करेगा? ईरान ने घोषणा की है कि वह परमाणु गतिविधियों का दायरा बढ़ाएगा और उन गतिविधियों को पुनः शुरू करेगा जिन्हें उसने परमाणु समझौते के तहत रोक दिया था। दूसरी बात यह है कि ईरान जिन विभागों में तेज़ी से उन्नति कर रहा है वह केवल परमाणु तकनीक तक सीमित नहीं हैं कि यदि परमाणु समझौता समाप्त हो गया तो आसमान ज़मीन पर आ जाएगा। यह बात तो सही है कि परमाणु समझौते पर अमल करने के बदले यह वादा किया गया था कि ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान की अर्थ व्यवस्था का विकास इन प्रतिबंधों के हटने पर निर्भर है। ईरान पहले से ही अर्थ व्यवस्था को स्वाधीन बनाने की योजनाओं पर काम कर रहा है।
इससे यह भी समझा जा सकता है कि ईरान की अर्थ व्यवस्था को ध्वस्त कर देने का अमरीका का सपना कभी पूरा नहीं होगा। ईरान पिछले चालीस साल के दौरान अमरीका तथा पश्चिमी देशों के भारी दबावों यहां तक कि थोपे गए युद्ध के बावजदू आर्थिक क्षेत्र सहित सभी क्षेत्रों में लगातार तरक़्क़ी करता रहा। इस समय ईरान की जीडीपी का आकार 439 अरब डालर का है जिसमें लगातार विस्तार हो रहा है।
ईरान दूसरे अनेक क्षेत्रों में भी सतत प्रगति कर रहा है। इसका अंदाज़ा उन देशों के बयानों से लगाया जा सकता है जो ईरान विरोधी हैं। यह देश पहले तो ईरान में सत्ता बदलने की बात कर रहे थे आज इन देशों की चिंता यह है कि ईरान पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में स्थित देशों में अपनी पैठ बनाता जा रहा है तो इस स्थिति को निश्चित रूप से ईरान की रणनीति की प्रगति ही कहा जाएगा। इसका मतलब यह है कि प्रतिबंध लगाकर अमरीका या उसके घटक देशों का ईरान के बारे में कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं होगा। यही वजह है कि अमरीका के घटकों ने भी उसे नसीहत की कि वह ईरान पर प्रतिबंध लगाने के अपने फ़ैसले पर पुनरविचार करे क्योंकि इन प्रतिबंधों से ईरान का कुछ नहीं बिगड़ेगा। ईरान के लिए समस्याएं तो उत्पन्न होंगी लेकिन इस देश का हर विभाग जिस तरह आगे बढ़ रहा है उसी तरह आगे बढ़ता जाएगा।
सवाल यह उठता है कि जब प्रतिबंधों का कोई फ़ायदा नहीं है तो अमरीका इस मार्ग पर क्यों चल रहा है? जवाब यह है कि अमरीका में निर्णय लेने की प्रक्रिया में काफ़ी समस्याएं हैं। ईरान के बारे में ही नहीं अनेक मुद्दों के बारे में अमरीकी नीति निर्धारक ग़लत फ़ैसले कर रहे हैं और इसका नुकसान भी उठा रहे हैं।