अर्दोगान ने अपने रूसी समकक्ष व्लादमीर पुतीन के साथ जो संयुक्त संवाददाता सम्मेलन किया उसमें उन्होंने इन दोनों में स किसी भी मुद्दे पर विस्तार से कुछ नहीं कहा बल्कि विशेष रूप से आर्थिक विषयों और व्यापारिक लेनदेन के बार में बात की। उन्होंने कहा कि दोनों देश बहुत कम समय में व्यापारिक लेनदेन सालाना 100 अरब डालर के स्तर तक पहुंचाना चाहते हैं।
व्यापारिक लेनदेन ज़रूरी चीज़ है लेकिन इस समय जो मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है वह एस-400 मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम से संबंधित है। यह सिस्टम तुर्की को आगामी जुलाई महीने में प्राप्त होने वाला है और तुर्की इसकी क़ीमत की कुछ क़िस्तें अदा कर चुका है। अमरीकी प्रशासन चाहता है कि तुर्की यह सौदा रद्द कर दे और इसकी जगह अमरीका से पेट्रियट मिसाइल ख़रीदे, अगर तुर्की ने एसा न किया तो उसे कठोर अमरीकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
सीरिया के मामले में रूसी राष्ट्रपति पुतीन तुर्क राष्ट्रपति से यह चाहते हैं कि आतंकी घोषित किए जा चुके संगठनों के बारे में अपने वादे पर अमल करें। विशेष रूप से अन्नुस्रा फ़्रंट के ख़िलाफ़ कार्यवाही करें जिसने अब अपना नाम हैअत तहरीरुश्शाम रख लिया है। यह आतंकी संगठन सीरिया के इदलिब प्रांत के 80 प्रतिशत भागों पर क़ब्ज़ा जमाए बैठा है। क्या अर्दोग़ान अब इस आतंकी संगठन के ख़िलाफ़ कार्यावाही करेंगे?
राष्ट्रपति मास्को यात्रा पर गए हैं तो इस समय वह बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं उनकी पार्टी देश के चार प्रमुख शहरों इस्तांबूल, अंकारा, इज़मीर और अंतालिया में नगरपालिकाओं के चुनाव हार गई है, तुर्की की अर्थ व्यवस्था कठिनाई में है और आने वाले महीनों में आर्थिक संकट और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, तुर्की की करेन्सी लीरा के मूल्य में गिरावट आई है।
राष्ट्रपति अर्दोग़ान के पास विकल्प बहुत कम बचे हैं।
पहला विकल्प यह है कि वह रूस से एस़-400 ख़रीदने की दिशा में आगे बढ़े और अमरीकी प्रतिबंधों का मुक़ाबला करे या इस सौदे से पीछे हट जाए और अमरीकी ख़ैमे में लौट आए, अमरीका की शर्त मानकर उससे पेट्रियट मिसाइल सिस्टम ख़रीद ले मगर इस स्थिति में उसे अपने नए घटक यानी रूस से हाथ धोना पड़ जाएगा।
दूसरा विकल्प यह है कि अपनी सेना इदलिब में उतारे और अन्नुस्रा संगठन का सफ़ाया कर दे मगर इस स्थिति में इदलिब के लाखों लोग पलायन करके तुर्की में शरण लेंगे और अन्नुस्रा फ़्रंट के हज़ारों लोग मारे जाएंगे। इस तरह चरमपंथी संगठनों में राष्ट्रपति अर्दोग़ान की छवि बहुत ख़राब होगी जो इन संगठनों के समर्थक समझे जाते हैं।
तीसरा विकल्प यह है कि वह रूस के सुझाव के अनुसार पहले सीरिया में फ़ुरात नदी के पूर्वी हिस्से के मामले को पहले हल करे जबकि उत्तरी और पश्चिमी सीरिया के संकट पर बाद में ध्यान दे और इसे वर्ष 1998 में सीरिया और तुर्की के मध्य हुए समझौते के आधार पर हल किया जाए यानी तुर्की दमिश्क़ के साथ अपने संबंधों को बहाल करे दोनों देश वार्ता की मेज़ पर बैठें और इस समझौते को लागू करने पर बात करें अर्थात इसके तहत दोनों देशों की शांति की सुरक्षा के लिए आपसी समन्वय बनाया जाए और आतंकी संगठनों का मुक़ाबला करें।
हमें नहीं पता कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान कौन सा विकल्प अपनाएंगे मगर यह तो तय है कि तुर्की को यह तय करना होगा कि रूस के साथ खड़े होना है या अमरीका के साथ। दोनों को साथ में लेकर चल पाना अब असंभव हो गया है क्योंकि यह दोनों देश तेल और पानी की तरह है जो आपस में मिल नहीं सकते।
देश के भीतर भी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान की स्थिति बहुत कठिन हो चुकी है। उन पर दबाव बहुत ज़्यादा है, उन पर अधिका दबाव अमरीका की ओर से पड़ रहा है। वह जिस विकल्प को भी चुनेंगे उसके कुछ फ़ायदे और कुछ नुक़सान होंगे यदि अर्दोग़ान की जगह हम होते तो हम रूसी ख़ैमे का चयन करते और पश्चिम के बजाए पूरब और इस्लामी देशों अर्थात इराक़, सीरिया और ईरान की ओर झुकाव बढ़ाते मगर अर्दोग़ान की जगह हम नहीं हैं और न हम उनके सलाहकारों में शामिल हैं जिनमें से कुछ की राय मानकर अर्दोग़ान इस समय इस संकट में फंसे हैं विशेष कर सीरिया के मामले में।