उन्होंने अपने भाषण में कई विषयों की ओर संकेत किया जो अंतर्राष्ट्रीय आयाम से विचार योग्य हैं क्योंकि ये विषय सभी देशों के भविष्य से संबंधित है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जेसीपीओए और अमरीका की ओर से अपनी कटिबद्धताओं के पालन के विषय से पूरी दुनिया अवगत है। राष्ट्रपति रूहानी ने अपने भाषण में एक अन्य अहम विषय की ओर इशारा किया और वह अमरीका से वार्ता है। अमरीका ने अपनी नीति का आधार झूठ, आरोप और ज़ोर-ज़बरदस्ती पर रखा है। ईरानी राष्ट्र जिसे अमरीका की दुश्मनी और वचन तोड़ने के रवैये का लगभग आधी सदी का अनुभव है, अमरीका पर तनिक भी भरोसा नहीं करता। स्पष्ट है कि परमाणु मामला भी आरंभ से ही केवल एक बहाना था।
अस्ल बात यह है कि विश्व समुदाय को एेसी अमरीकी सरकार का सामना है जो केवल ब्लैक मेलिंग और ज़ोर-ज़बरदस्ती तथा अपनी एकपक्षीय इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश में लगी हुई है। ट्रम्प अपने हर फ़ैसले को "एेसा ही होना चाहिए" से जोड़ देते हैं और इस रवैये के साथ वार्ता की बात कर रहे हैं। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने एक बार इस को उजागर करते हुए कहा था कि अमरीका के साथ हमारी बहुत सी समस्याएं हल होने योग्य ही नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि हमसे अमरीका को समस्या स्वयं हम ही को लेकर है, अर्थात स्वयं इस्लामी गणतंत्र। न परमाणु ऊर्जा कोई समस्या है और न ही मानवाधिकार की कोई बात है। अमरीका की मुख्य समस्या इस्लामी गणतंत्र है।
इन्हीं वास्तविकताओं के दृष्टिगत राष्ट्रपति रूहानी ने अपने भाषण में, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बारे में अमरीका की समझ को धौंस और बल पर आधारित बताया और वैश्विक हितों की रक्षा पर बल देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ को इस बात की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि उसके प्रस्ताव, कुछ सदस्यों के चुनावी व प्रचारिक खेल में हाईजैक कर लिए जाएं।