4 सितंबर 2018 - 14:15
ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका की हां में हां नहीं मिलाने के लिए तुर्की और क़तर को इतनी बड़ी सज़ा

वर्षों से तुर्की और क़तर मध्यपूर्व में अमरीका और पश्चिमी साम्राज्यवाद के अग्रदूत रहे हैं, यहां तक कि सीरिया संकट की आग में उनकी उंगलियां तक झुलस गई हैं।

हालांकि इन दोनों देशों ने ही ईरान के बारे में वाशिंगटन की नीतियों में सहयोगी बनने से इनकार कर दिया, जिसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की पहली विदेश यात्रा के रूप में सऊदी अरब का चयन दो कारणों से महत्वपूर्ण था, रियाज़ के साथ अरबों डॉलर का हथियारों का समझौता और क़तर की घेराबंदी की शुरूआत।

सऊदी अरब, यूएई, बहरैन और मिस्र द्वारा क़तर की ज़मीनी, समुद्री और वायु घेराबंदी को ट्रम्प ने ही अपनी रियाज़ यात्रा के दौरान हरी झंडी दिखाई थी।

हालांकि ईरान और तुर्की ने आगे बढ़कर क़तर पर पड़ने वाले इस घेराबंदी के परिणामों को काफ़ी हद तक सीमित कर दिया।

पिछले महीने तुर्की को एक बड़े आर्थिक हमले का सामना करना पड़ा, जिसके व्यापक विनाशकारी परिणाम सामने आते रहेंगे। पहले से आर्थिक युद्ध का सामना कर रहे तुर्की पर 10 अगस्त को ट्रम्प ने स्टील और एलमूनियम के दोहरे टेरिफ़ लगा दिए, जिससे तुर्क लीरा डॉलर के मुक़ाबले में औंधे मुंह गिर गया।

यह कड़ी सज़ा उन देशों को दी गई है जो क्षेत्र में अमरीका के प्रमुख घटक माने जाते रहे हैं।

तुर्की में 1954 से अमरीका का एक बड़ा सैन्य अड्डा है। इसी प्रकार, क़तर में अमरीका का फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों में सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है।

इसी प्रकार, क़तर में भी अन्य फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों की तरह शासन करने वाला परिवार अमरीका से ख़रीदे जाने वाले हथियारों के सहारे अपना शासन बचाए हुए है।

इसके अलावा, तुर्की और क़तर ने 2011 में सीरिया में बशार असद को सत्ता से हटाने के लिए ख़ुद को सीरियाई संकट में झोंक दिया। हालांकि इससे पहले तुर्क राष्ट्रपति रजब तैय्यब अर्दोगान के अपने पड़ोसी देश के साथ अच्छे संबंध थे, इसके बावजूद उन्होंने यह अनुमान लगाया कि सीरिया में विदेशी समर्थन प्राप्त आतंकवादी गुटों की जीत होने जा रही है।

सीरियाई संकट में वाशिंगटन और तेल-अवीव के लिए तुर्की का सहयोग और उसकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी।

इंटरनेश्नल क्राइज़िज़ ग्रूप या अंतरराष्ट्रीय संकट गुट की रिपोर्ट के मुताबिक़, केवल 3 वर्षों में तुर्की ने सीरिया युद्ध में 3 अरब डॉलर से अधिक ख़र्च किए थे। इसके अलावा, सीरिया युद्ध का ख़र्चा 2014 में प्रतिवर्ष 17 फ़ीसद की वृद्धि के साथ 17 अरब डॉलर से बढ़कर 22.6 अरब डॉलर पहुंच गया था।

इसके अलावा भी सीरिया युद्ध में हस्तक्षेप के कारण तुर्की को अरबों डॉलर की चपत लगी और क़तर ने भी अरबों डॉलर सीरिया में सशस्त्र विद्रोही गुटों के समर्थन पर ख़र्च कर दिए।

इसके बावजूद, दोनों के पास सीरियाई संकट में अपनी जली हुई उंगलियों और अपनी अर्थव्यवस्था को लगने वाले बड़े झटकों के अलावा दिखाने के लिए कुछ नहीं है।

2016 तक तुर्की और क़तर यह समझ चुके थे कि पश्चिम के सहयोग से सीरियाई सरकार का पतन संभव नहीं है और असद को कि जिन्हें ईरान और रूस का समर्थन प्राप्त है, कोई शक्ति सत्ता से नहीं हटा सकती। इस वास्तविकता ने तुर्की और क़तर की विदेश नीति में फिर से एक बड़ा बदलाव किया और तुर्की रूस और ईरान से निकट आने के साथ साथ सीरियाई सरकार से भी अपने संबंधों के सुधार में लग गया।

इसके बाद, जब ट्रम्प ने ईरान के ख़िलाफ़ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर युद्ध का नगाड़ा बजाना शुरू किया तो तुर्की और क़तर ने इसमें सहयोग के लिए किसी तरह की कोई रूची नहीं दिखाई। सज़ा के रूप में ट्रम्प प्रशासन ने दोनों के ख़िलाफ़ आर्थिक युद्ध छेड़ दिया है। लेकिन इस आर्थिक युद्ध में अमरीका की जीत को लेकर विशेषज्ञ आश्वस्त नहीं हैं।