23 नवंबर 2014 - 14:59
तकफ़ीरी आतंकवादियों के ग़लत विचारों को सुधारना अत्यंत आवश्यक, केवल फ़ौजी कार्यवाही पर्याप्त नहीं।

आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने इस्लामी दुनिया में तकफीरियों द्वारा अंजाम पाने वाले भयानक अपराधों की ओर इशारा करते हुए कहा कि आखिर कब तक हम हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखते रहें?

अहलेबैत समाचार एजेंसी अबना की रिपोर्ट के अनुसार कट्टरपंथी व तकफ़ीरी विचारधाराओं के शीर्षक पर आयोजित सम्मेलन के लक्ष्य और उद्देश्य के बारे में सम्मेलन के महासचिव द्वारा रिपोर्ट पेश किये जाने के बाद आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने “उल्मा-ए-इस्लाम की निगाह में कट्टरपंथी और तकफ़ीरी विचारधाराओं पर अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन” में अपने उद्घाटन भाषण में कहा: मैं आप सभी का स्वागत करता हूं और इस सम्मेलन में उपस्थित होने पर आप सभी का आभारी हूँ। आजकल के हालात में ज़रूरी है कि इस गुमराह गुट के पीछे कौन है इसकी समीक्षा की जाए और उनके विचारों को समझ कर उनकी जड़ों को काट दिया जाए।
आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने इस्लामी दुनिया में तकफीरियों द्वारा अंजाम पाने वाले भयानक अपराधों की ओर इशारा करते हुए कहा कि आखिर कब तक हम हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखते रहें?

उन्होंने कहा कि आज हम यहां इकट्ठा हुए हैं ताकि इस्लामी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समस्या के संबंध में बातचीत करें और तकफीरियों के मनहूस कामों के लिए कोई उचित समाधान ढ़ूंढ़े।
आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने कहा: इस्लाम यहां तक गैर मुस्लिमों के लिए प्यार और मेहरबानी का धर्म है। हमें दुनिया वालों के लिए यह साबित करने की जरूरत है कि तकफीरियों के मनहूस और घृणित कामों और उनके चरित्र का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है और जो दोखा खाया जवान वर्ग उनसे जा मिला है उसे उनसे अलग करने की ज़रूरत है। इस तकफीरी गिरोह से फौजी मुक़ाबला वाजिब और महत्वपूर्ण है लेकिन पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम उल्मा द्वारा उनकी जड़ों को काट दिया जाए।
उसके बाद आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने सम्मेलन में हिस्सा लेने वालों को अरबी भाषा में संबोधित किया जिसका अनुवाद यहां प्रस्तुत किया जा रहा है:
हमारे तीन मुख्य लक्ष्य और उद्देश्य हैं:
पहला लक्ष्य यह है कि हम इस बात की घोषणा करें कि सभी मुस्लिम उल्मा की इस बात पर आम सहमति है कि तकफीरियों के अपराध व चरित्र का इस्लाम से कोई सम्बंध नहीं है।
दूसरा लक्ष्य यह है कि वह जवान जो तकफीरियों से जा मिले हैं उन्हें जहन्नम की आग से मुक्ति दिलाई जाए। इसलिए कि अल्लाह फ़रमाता है कि जो इंसान किसी मोमिन की जानबूझ कर हत्या करे वह हमेशा जहन्नम में रहेगा।
तीसरा लक्ष्य यह है कि आपस में मिल बैठ कर बातचीत की जाए और एक दूसरे की सलाह से कोई ऐसा रास्ता हल निकाला जाए जिससे इस्लामी राष्ट्र इस संकट से अपने को नजात दिला सकें।
हम चाहेंगे कि इस अभियान में तीन बुनियादी सिद्धांतों पर ध्यान दिया जाए और इन सीमाओं से आगे न बढ़ाया जाए:
1. पहले यह कि कट्टरपंथी धार्मिक और विभिन्न राजनीतिक मुद्दों से बचना।
2. दूसरे यह कि धार्मिक मतभेदों को हवा देने वाले मुद्दों यहाँ तक एक शब्द से भी बचना।
3. सभी इस्लामी धर्मों का सम्मान।
इसके बाद तकफीरी आंदोलनों से उत्पन्न होने वाले खतरों की पहचान कराते हुए आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने कहा: अफ़सोस की बात यह है कि इन तकफीरी समूहों ने इस्लामी दुश्मनों के लिए यह अवसर प्रदान किया है कि वह इस्लाम को अत्याचार, हिंसा और बर्बरता के समर्थक के रूप में पहचनवाएँ।
उन्होंने “दाइश” द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले नाम “इराक़ और सीरिया में इस्लामी हुकूमत” की ओर इशारा करते हुए कहा कि दाइश न तो कोई “हुकूमत” है और न ही “इस्लामी” है। लेकिन इसके बावजूद इस्लामी दुश्मन लगातार इस नाम को दोहराते हैं ताकि इस्लाम को बदनाम कर सकें।
आज यह स्थिति है कि कुरआन की शिक्षाओं को भुला दिए जाने के बाद ऐसे बहुत से अपराध अंजाम दिए जा रहे हैं कि जिससे इस्लाम की छवि धूमिल दिखाई देती है।
जरूरत इस बात की है कि हम इस तरह की गुमराहियों की नींव को पहचानें। वहाबी विचारधारा से जुड़े बहुत से लोगों ने हिंसा और बर्बरता की निंदा की है। यहां तक सऊदी अरब के मुफ्ती आजम ने भी दो फतवे जारी किए हैं। पहले फ़त्वे में उन्होंने कहा है कि अतिवादी, कट्टरपंथी और आतंकी विचारधारा व सिद्धांत कि जिनकी वजह से जमीन पर दंगा व फसाद होता है, उनका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।
इस फ़त्वे में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस तरह के विचार रखने वाले जहन्नमी हैं।
दूसरे फ़त्वे में भी उन्होंने पूरे जोर-शोर के साथ आशूर के दिन “अलएहसा” नामक जगह पर होने वाले आतंकवादी हमलों की निंदा की है और साथ ही इन हमलों में लिप्त होने वालों के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा की मांग की है.। इस प्रकार के फतवे निश्चित रूप से प्रशंसनीय हैं।
आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने कहा: हमें चरमपंथियों की बुराई से इस्लाम को सुरक्षित बनाना होगा।
यहाँ ज़रूरी है कि पॉप और वेटिकन की प्रतिक्रियाओं की ओर भी इशारा करूं। मैंने उन्हें एक पत्र लिखकर स्पष्ट रूप से इस बात की घोषणा की कि इस तरह के काम हराम हैं और आपको केवल मुसलमानों के खिलाफ किए जाने वाले हमलों को हराम बताने पर संतोष नहीं करना चाहिए बल्कि जरूरत इस बात की है कि आप मुसलमानों और ईसाइयों की बराबर से रक्षा करें।
जवाब में पॉप ने भी एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने कहा कि हम आपके इस पक्ष पर आपका आभार व्यक्त करते हैं।
शिया मरजा-ए-तक़लीद ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तकफीरियों की मौलिक विशेषताओ की ओर इशारा किया और कहा:
1. अपनी राय को दूसरों पर थोपना:
तकफीरियों ने क़ुरआन और सुन्नत के समझने को अपनी जागीर समझ लिया है और उनका कहना है कि शिर्क, ईमान, बिदअत व नवाचार और तवस्सुल (सिफ़ारिश) का वही मतलब सही है जो हम कहते हैं। जबकि बहुत से अहले सुन्नत उल्मा भी उनके साथ सहमत नहीं हैं। ख़ुद यह उल्मा भी उनकी नज़र में काफिर हैं! (जो उनके विचारों से सहमत न हों।)
बेहतर था कि वह ("فاسئلوا اھل الذکر ان کنتم لا تعلمون") पर अमल करते और विभिन्न देशों से सम्बंध रखने वाले बुज़ुर्ग उल्मा से सलाह लेते ताकि नजात पा जाते।
2. कुछ आयतों पर विश्वास और कुछ अन्य का इंकार:
यह लोग कुछ उन आयतों पर विश्वास रखते हैं जो उनके विचारों से मेल खाती हैं जबकि कुछ अन्य आयतों की उपेक्षा करते हैं। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने कहा तकफीरी, कुरानी आयतों से ग़लत और एकतरफा मतलब को समझते हुए उन सभी लोगों को काफिर कहते हैं जो पैगम्बर स.अ और अल्लाह के वलियों से मदद मांगते हैं। यहां तक कि वह लोग इन लोगों और जाहेलियत के दौर के काफ़िरों के बीच न केवल यह कि किसी अंतर को स्वीकार नहीं करते बल्कि तवस्सुल करने वालों को जाहेलियत के काफ़िरों से भी बदतर बताते हैं।
जबकि कुरानी आयतों में शिर्क और ईमान का मुद्दा बिल्कुल स्पष्ट है और मुशरिक उसे कहा जाता है जो अल्लाह के लिए शरीक और साथी का विश्वास रखता हो और दूसरों को अल्लाह के बराबर मानता हो।
हमारा एक सवाल है कि क्या ऐसा कोई मुसलमान है जो अल्लाह के वलियों को अल्लाह का साझेदार मानता हो या ख़ुदा के बराबर जानता हो या अल्लाह जैसा समझता हो? क्या सभी मुसलमान इस बात पर विश्वास नहीं रखते कि अल्लाह के वलियों के सभी चमत्कार और उनकी करामतें सब अल्लाह ही मर्ज़ी व इच्छानुसार होती हैं?
उन्होंने जनाबे ईसा द्वारा अंजाम पाने वाले चमत्कार की ओर इशारा करते हुए कहा: क्या हज़रत ईसा मुशरिक थे? क्या हज़रत ईसा के साथी और हवारी जिन्होंने हज़रत ईसा से चमत्कार की मांग की सबके सब काफ़िर हो गए थे? उन लोगों का खून बहाना वैध था?
अगर यह तकफ़ीरी लोग उस युग में भी होते तब भी हज़रत ईसा के सिलसिले में यही करते और यही कहते। क्योंकि यह लोग इस बात को नहीं समझते कि यह सभी मामले अल्लाह की अनुमति से अंजाम पाते हैं।
आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने तौहीद (एकेश्वरवाद) के सही विश्वास की व्याख्या करते हुए कहा कि शिफ़ाअत और तवस्सुल केवल अल्लाह की अनुमति से संभव है और अल्लाह के वली बिना उसकी अनुमति व इच्छा के कोई काम नहीं करते हैं।
हम बहुत ही अफ़सोस के साथ इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि तकफ़ीरियों ने इस्लाम और कुरआन को बिल्कुल भी नहीं समझा है। ऐसा इसलिए है कि वास्तविक उल्मा से वह दूर रहे हैं जिसके परिणाम स्वरूप वह कुरआनी आयतों की ग़लत तफ़सीर व व्याख्या करते हैं।
हम आम तौर पर केवल कठिनाइयों और दर्द का उल्लेख करते हैं जबकि जरूरत इस बात की है कि समाधान और उपचार को ढ़ूढ़ा जाए तो अनगिनत कठिनाइयों का स्रोत बनने वाले विचारों और दृष्टिकोणों का अंत किया जा सके और मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता का माहौल बन सके।
क़ुरआन करीम ने फूट डालने को भी शिर्क का एक परिमाणक बताते हुए कहा है: मुशरिकों और जो लोग फूट का शिकार हो गए हैं उनमें से मत हो जाना।
इस साल को हिंसा और आतंकवाद से खाली साल का नाम दिया गया है, लेकिन हम देख रहे हैं कि बहुत सों का खून बहाया जा रहा है और मुसलमानों के माल, सम्मान व मर्यादा से खिलवाड़ किया जा रहा है। उधर पश्चिमी और अरब देश केवल सैन्य समाधान पर संतोष किए हुए हैं जबकि यह पर्याप्त नहीं है और जरूरत है कि इन घटिया विचारों के पीछे के कारकों को पैदा कर के संकट का हल ढ़ूंढ़ा जाए।
आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने अपने भाषण के अंत में तकफीरियों को वुजूद में लाने वाले कारणों और प्रेरणाओं पर विचार करने के लिए यह प्रस्ताव रखा कि इस सम्मेलन का एक स्थायी विभाग बनाया जाए जिसका मुख्य कार्यालय इस्लामी दुनिया के एक महत्वपूर्ण शहर में हो मुस्लिम उल्मा उसकी सदस्यता स्वीकार करें और इन तकफीरी और आतंकी गतिविधियों को ख़त्म करने के लिये उचित समाधान पर रिसर्च करें।