16 जुलाई 2013 - 19:30
रमज़ानुल मुबारक -5

क़ुरआने करीम, अल्लाह पर ईमान रखने वालों को यह ख़बर देता है कि उसने तुम लोगों पर रोज़ा वाजिब किया ताकि उसके द्वारा तुम लोग, अल्लाह तक पहुंच सको क्योंकि वास्तव में अगर देखा जाए तो कुछ महत्वपूर्ण इबादतों को छोड़ कर रोज़े की तरह कोई भी इबादत इंसान को उस ऊंचे स्थान तक पहुंचाने में कामयाब नहीं होती।

क़ुरआने करीम, अल्लाह पर ईमान रखने वालों को यह ख़बर देता है कि उसने तुम लोगों पर रोज़ा वाजिब किया ताकि उसके द्वारा तुम लोग, अल्लाह तक पहुंच सको क्योंकि वास्तव में अगर देखा जाए तो कुछ महत्वपूर्ण इबादतों को छोड़ कर रोज़े की तरह कोई भी इबादत इंसान को उस ऊंचे स्थान तक पहुंचाने में कामयाब नहीं होती।इस्लामी इतिहास में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़माने में एक महिला ने अपनी दासी को गाली दी। कुछ देर के बाद उसकी दासी बुढ़िया के लिए खाना लाई। खाना देखकर बुढ़िया ने कहा कि मैं तो रोज़े से हूं। जब यह पूरी घटना पैग़म्बरे इस्लाम (स) कों बताई गई तो आपने कहा कि यह कैसा रोज़ा है जिसके दौरान वह गाली भी देती है?इस तरह यह स्पष्ट होता है कि रोज़ा रखने का मतलब केवल यह नहीं है कि रोज़ा रखने वाला खाने-पीने से पूरी तरह से परहेज़ करे बल्कि अल्लाह ने रोज़े को हर तरह की बुराई से दूर रहने का साधन बनाया है। रोज़े के बारे में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं- गुनाहों के बारे में विचार करने से मन का रोज़ा, खाने-पीने की चीज़ों से पेट के रोज़े से ज़्यादा श्रेष्ठ होता है। जिस्म का रोज़ा, स्वेच्छा से खाने-पीने से दूर रहना है जबकि मन का रोज़ा, समस्त इन्द्रियों को गुनाह से बचाता है। इस तरह की हदीसों और महान हस्तियों के कथनों से यह समझ में आता है कि वास्तविक रोज़ा, अल्लाह की पहचान हासिल करना और गुनाहों से दूर रहना है। रोज़े से मन व रूह की ताक़त में बढोत्तरी होती है।पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन हैः आध्यात्मिक लोगों का मन, अल्लाह से डर का स्रोत है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की हदीस है कि अल्लाह से डर, दीन का फल और विश्वास की निशानी है। इस तरह से अगर कोई यह जानना चाहता है कि उसका रोज़ा सही है और उसे अल्लाह ने क़बूल किया है या नहीं तो उसे अपने मन की भावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम ने रोज़ेदार के मन में विश्वास और अल्लाह से डर पैदा होने के बारे में इस तरह कहा है- बंदे उसी समय अल्लाह से डरने वाला होगा जब उस चीज़ को अल्लाह के रास्ते में त्याग दे जिसके लिए उसने बहुत ज़्यादा मेहनत की हो और जिसे बचाए रखने के लिए बहुत मेहनत की जाए।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने अपने एक साथी हज़रत अबूज़र से कहाः ऐ अबूज़र, ईमान रखने वालों में से वही है जो अपना हिसाब, दो भागीदारियों के बीच होने वाले हिसाब से ज़्यादा कड़ाई से ले और उसे यह पता हो कि उसका आहार और उसके कपड़े कहां से हासिल होता है वैध रूप में या अवैध ढंग से।