अहलेबैत न्यूज़ एजेंसी (अबना) की रिपोर्ट के अनुसार अमरीकन मैगज़ीन नेशन नें लिखा है: 26 फ़रवरी को क़ज़ाक़िस्तान में अमरीका सहित दुनिया की बड़ी ताक़तों और ईरान में बात चीत होने जा रही है। लेकिन यहाँ भी किसी नतीजे तक पहुँचने की उम्मीद कम ही नज़र आ रही है। इसके दो कारण हैं: एक यह कि देखने में लगता है कि अमरीका अभी इस बात पर तैयार नहीं हुआ है कि ईरान का अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन का अधिकार स्वीकार कर के आर्थिक पाबंदियों में कमी को समझौते का हिस्सा बनाए। दूसरी ओर ईरान भी जून में हो रहे राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों में लगा है और इस लिये शैताने बुज़ुर्ग से किसी समझौते के लिये तैयार नहीं लग रहा है।
हालांकि ईरान नें तनाव कम करने के लिये कुछ क़दम ज़रूर उठाए हैं जैसे बीस प्रतिशत संवर्धन किये गए यूरेनियम को रिसर्च रिएक्टर के ईंधन में बदल देना जिसके नतीजे में यूरेनियम हथियार बनाने के लिये उचित नहीं होगा।
नेशन लिखता है कि यहाँ सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनाई के हाल ही में दिये गए एक अहम भाषण पर नज़र डालना मुनासिब मालूम पड़ता है। यह भाषण ईरानी डेलीगेशन नें यू. एन. ओ. में पेश किया है। आयतुल्लाह ख़ामेनाई नें अमरीका पर आरोप लगाया कि वह ईरान पर क़ब्ज़े की फ़िराक में है। अगर इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान जंग और साथ ही इलाक़े में अमरीका की बड़े पैमाने पर मौजूदगी मद्देनज़र रखी जाए तो यह बात कोई अनुचित मालूम नहीं होती।
सुप्रीम लीडर नें कहा:
“तीस साल से ज़्यादा का समय बीत चुका है। ईरानी क़ौम के दुश्मन उसे नुक़सान पहुँचाने के लिये जो कुछ कर सकते थे कर चुके हैं। ऐसी कोई चीज़ बची नहीं है जो उन्होंनें ईरानी क़ौम के ख़िलाफ़ एस्तेमाल न की हो, लड़ाईयां, जंग, इस्लामिक रिपब्लिक के दुश्मनों की हर तरह से मदद की और आम जंग के साथ साथ साफ़्ट वॉर भी छेड़ दी। जो कुछ उनके पास था उसे हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया, साज़िशें कीं, कूदता करवाने की कोशिश, फ़ौजी लड़ाई करवाई, मुसाफ़िर जहाज़ निशाना बनाए, सख़्त से सख़्त पाबंदियां लगाईं और उनमें हर रोज़ बढ़ोत्तरी हो रही है।”
नेशन लिखता है कि इस सबके अलावा अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा नें ईरान पर एक बड़ा साईबर हमला भी किया है कि अगर यही काम ईरान की तरफ़ से अमरीका के ख़िलाफ़ किया जाता तो इसे जंग की शुरुवात माना जाता। केवल यही नहीं बल्कि अमरीका और इस्राईल नें ईरानी साइंटिस्ट्स को मारने का भी प्लान बना रखा था।
अमरीकन मैग्ज़ीन के अनुसार मीडिया में तो यह ख़बरें आईं कि आयतुल्लाह ख़ामेनाई नें बात चीत के सारे दरवाज़े बंद कर दिये हैं लेकिन अस्ल में आप नें कहा था:
“अमरीकी अब फिर से बात चीत का मुद्दा उठा रहे हैं। बार बार कह रहे हैं कि अमरीका ईरान के साथ सीधी बात चीत के लिये तैयार है। यह कोई नई बात नहीं है। यह लोग कई बार बात चीत का मुद्दा उठा चुके हैं। अब यही उनके नये राजनीतिज्ञ दोहरा रहे हैं कि हमें बात चीत करनी चाहिये और कहते हैं कि गेंद ईरान के पाले में है। जी नहीं यह आपको बताना होगा कि धौंस, दबाव के आधार पर बात चीत के माने क्या होते हैं? बात चीत से तो इन्सान की नेक नियती और अच्छे चरित्र का पता चलता है। आप लोग दर्जनों ऐसे काम कर चुके हैं जिनसे पता चलता है कि आपकी नियत साफ़ नहीं है, उसके बाद कहते हैं कि हम बात करना चाहते हैं। क्या अभी भी आप लोगों को उम्मीद है कि ईरानी क़ौम आप की नेक नियती का यक़ीन कर ले? हमें कभी भी आपकी नियत साफ़ नज़र नहीं आ रही है”।
नेशन नें लिखा कि आयतुल्लाह ख़ामेनाई यह इशारा कर रहे थे कि जब 2009 में बराक ओबामा राष्ट्रपति बने तो उन्होंनें ईरान की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन इन चार सालों में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया, ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की पाबंदियां, धमकियां, ईरान के दोस्त सीरिया के ख़िलाफ़ सुन्नी इस्लाम पसंद बाग़ियों की हिमायत। सब कुछ पहले की तरह चलता आ रहा है। वैज्ञानिकों की हत्या के हवाले से आयतुल्लाह ख़ामेनाई नें कहा, “उनके एजेंटों, साथियों और जायोनी जासूसों नें दिन दहाड़े इस्लामिक रिपब्लिक के साइंटिस्ट क़त्ल किये और इन लोगों नें इन आतंकवादी हमलों की निंदा तक नहीं की बल्कि उलटा उनकी हिमायत की। इनका पिछला रिकार्ड यह है। इन्होंनें यह सोच कर ईरानी क़ौम पर पाबंदियां लगाईं कि यह पाबंदियां इन्हें अपाहिज कर देंगी। साफ़ तौर पर अपाहिज का शब्द इस्तेमाल किया। किसे अपाहिज बनाना चाहते हो? ईरान की जनता को अपाहिज करना चाहते हो? तुम्हारी नियत साफ़ है?! बातचीत के तभी कोई माने होंगे जब दोनों तरफ़ नियत साफ़ हो और एक दूसरे को धोखा देने का पहले से प्रोग्राम न हो। बात चीत में दोनों की पोज़ीशन बराबर होनी चाहिये। बातचीत का मक़सद केवल बातचीत होना, इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना या सुपर पावर होने का ढ़ोंग रचने के लिये बातचीत की पेशकश करना, यह सब धोखा है, इनमें कोई भी सच्चाई नहीं है। मैं डिप्लोमैट नहीं हूँ, मैं क्रांतिकारी हूँ मैं खुलकर बात करता और सच कहता हूँ। डिप्लोमैट कहते कुछ हैं और मुराद कुछ और होती है। मैं सच कहता और खुलकर बात करता हूँ। बातचीत के तभी कोई अर्थ होंगे जब दोनों तरफ़ नियत साफ़ हों। तुम ख़ुद कहते हो दबाव और बातचीत। इन दोनों में मेल नहीं है। तुम ईरानी क़ौम की गन प्वाइंट पर रख कर कहते हो कि हमसे बात करो नहीं तो हम गोली मार देंगे। तुम इन बातों से ईरानी क़ौम को डराना चाहते हो, जान लो ईरान की पब्लिक इन बातों से नहीं डरती हैं”।
आयतुल्लाह ख़ामेनाई नें आगे चल कर कहा, “अमरीका से बातचीत से कोई समस्या हल नहीं होगी”।
नेशन मैग्ज़ीन आगे चलकर लिखती है कि अगर सही मानों में देखा जाए तो आयतुल्लाह ख़ामेनाई की लॉजिक पर एतराज़ करना मुश्किल है। ईरान आई. ए. ई. ए. और 5+1 मुल्कों से बातचीत कर रहा है।
राष्ट्रपति महमूद अहमदी नेजाद नें भी बातचीत के मक़सद पर रौशनी डाली है। उन्होंनें आयतुल्लाह ख़ामेनाई के भाषण से एक दिन पहले कहा था, “तुम अपनी बंदूक़ें ईरानी क़ौम के सामने से हटा लो तो मैं ख़ुद तुमसे बात करुँगा।”
पश्चिमी मीडिया नें दोनों के बयानों को इस तरह की कवरेज दी जिससे पता चले कि इनमें अमरीका से बातचीत के हवाले से विवाद पाया जाता है। महमूद अहमदी नेजाद चाहते हैं कि अगर अमरीका दबाव कम कर दे तो बात चीत सम्भव है लेकिन आयतुल्लाह ख़ामेनाई किसी भी तरह की बातचीत को रद्द करते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि आयतुल्लाह ख़ामेनाई और राष्ट्रपति महमूद अहमदी नेजाद एक ही बात कह रहे हैं वह यह कि जब तक ईरानियों के सर पर बंदूक़ रहेगी अमरीका से किसी भी तरह की बातचीत नहीं हो सकेगी। जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि अमरीका साफ़ दिल से उनसे बात करना चाहता है तो उस दिन वह भी टेबल पर होंगे।