1. इतिहासिक परिवर्तन अथवा इतिहास में उतार, चढ़ाव के आधार पर एक संदेहयह संदेह इतिहासिक सभ्यता और रहेन सहेन में परिवर्तन और सामाजिक व्यवस्था में उतार, चढ़ाव के आधार पर होता है। यह निश्चित बात है मनुष्य का सामाजिक जीवन विभिन्न मरहलों से गुज़रता है। एक युग में दासता का मुद्दा प्रचलित था और मनुष्य की उन्नति, प्रगति व विकास इसी में समझा जाता था कि कमज़ोर और निर्धन लोग दूसरों की दासता करें और उनकी हर संभव सेवा करें। ज़ाहिर सी बात है कि उस युग में दास और स्वामी के मध्य मनुष्य और ईश्वर जैसा अंतर होता था। क्यों कि उस युग में यह प्रथा थी कि कुछ शक्तिशाली लोग स्वामी और कुछ कमज़ोर लोग उनके सेवक और दास बनकर रहते थे और मनुष्यों के मध्य सम्बंध भी सेवक और स्वामी के अनुसार समझा जाता था। इसी आधार पर जिस तरह कमज़ोर लोग (सेवक और दास) तुच्छ और हीन समझे जाते थे उसी तरह समस्त लोग ईश्वर के दास और सेवक समझे जाते थे और ईश्वर उनका स्वामी और आक़ा। आज जब भक्ति और दासता का युग समाप्त हो चुका है तो इस युग का उस युग से मुक़ाबला नहीं किया जाना चाहिए।आज मनुष्य किसी भी ज़बरदस्ती को स्वीकार नहीं करता है और अपने को स्वामी समझता है न कि दास। अतः हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हम सेवक हैं और ईश्वर स्वामी, आज हमें स्वंय को ईश्वर का उत्तराधिकारी मानना चाहिए और जो ईश्वर का उत्तराधिकारी हो उसको भक्ति व उपासना का आभास कैसा? मानो ईश्वर से ईश्वरत्व समाप्त हो चुका है और यह लोग उसके सिंघासन और स्थान पर विराजमान हैं और जो चाहे करें जिस तरह कोई शासक अपना उत्तराधिकारी बनाए तो वह उसके समस्त अधिकार का मालिक बन जाता है और उसके काम, उसके काम होते हैं और उनके मध्य शासक और आदेशपालक का सम्बंध नहीं होता है, तो इस अवस्था में उत्तराधिकारी के कार्यों से किसी प्रकार की छानबीन और सवाल व जवाब नही होना चाहिए।इस युग में जबकि उन्नति व विकास और नई सभ्यता का प्रचलन है और हमारा जीवन एक उच्च श्रेणी और स्थिति पर पहुँच चुका है तो हम भक्ति व दासता के युग के नियमों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। यह नहीं हो सकता कि हम स्वामी के पीछे पीछे घूमते रहें, आज्ञापालन और अनुकरण का युग बहुत पहले गुज़र चुका है और अगर क़ुरआन में आदेश और दूसरे नियम मौजूद हैं तो वह दासता के युग के हैं। क्यों कि जिस समय रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, रसूल बने दासता का समय था और इस्लाम का पहला युग, ईश्वर और रसूल और लोगों के मध्य सम्बंध व सम्पर्क के लिए उचित था।कभी यह कहा जाता है कि मनुष्य अनिवार्य नियम का इच्छुक नहीं है परन्तु अधिकार का इच्छुक है और इसके दिमाग़ में कभी यह नहीं आता कि उस पर कोई कर्तव्य व उत्तरदायित्व है ताकि उसको अंजाम दे सके। मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर और दूसरों से अपने अधिकार को प्राप्त करे।सारांश यह कि जो लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, अइम्मा अलैहिमुस्सलाम और उनके उत्तराधिकारियों के अनुकरण का दम भरते हैं वह चौदह शताब्दी पहले किसी सामाजिक जीवन के अनुकूल है न आज के युग से। जब कि आज का सामाजिक जीवन बिल्कुल परिवर्तित हो चुका हैं कर्तव्य और उत्तरदायित्व की कोई बात नहीं करता बल्कि मानवीय अधिकारों की बातें होनी चाहिएं। मनुष्य को यह समझाना आवश्यक है कि तुझे यह अधिकार है कि जिस तरह भी चाहे जीवन गुज़ारे, तुझे अपनी इच्छा के अनुसार कपड़े पहनने का अधिकार है, जिस तरह भी चाहे अपना सामाजिक जीवन व्यवतीत करे।2. उपर्युक्त संदेह का उत्तर हम ऊपर वर्णन किये गए संदेह का उत्तर, स्वाभाविक व प्राकृतिक और धर्मशास्त्र के दृष्टिकोण के अनुसार प्रस्तुत करेंगे। क्यों कि हमारे सामने दो स्थितियाँ हैः स्वाभाविक व प्राकृतिक स्थिति और धर्मशास्त्र द्वारा प्रस्तुत की गई स्थिति। दूसरे शब्दों में वास्तविकता और होने की स्थिति और दूसरी स्थिति कर्तव्य (होना चाहिए)। यद्धपि उल्लिखित शब्दों के एक ही अर्थ है यद्धपि विभिन्न प्रकार के लोगों को समझाने के लिए विभिन्न शब्दों और परिभाषाओं की आवश्यकता होती है। अब हमें यहाँ देखना है कि स्वाभाविक व प्राकृतिक दृष्टि में हमारा ईश्वर से क्या सम्बंध है? क्यों कि अगर कोई ईश्वर को मानता ही न हो तो उसकी दृष्टि में ईश्वर से किसी प्रकार का सम्बंध भी व्यर्थ है।परन्तु अगर कोई ईश्वर पर विश्वास रखता हो या कम से कम स्वीकार करता हो कि उसने पैदा किया है (ईश्वर को मानने की यह सबसे कम श्रेणी है) और अपने को ईश्वर की सृष्टि जानता हो। यद्धपि ईश्वर की रचना पर विश्वास रखने से मनुष्य एकेश्वरवादी (ईश्वर को एक मानने वाला) नहीं बनता है बल्कि ईश्वरीय प्रतिपालन को स्वीकार करना अनिवार्य है। रचना में एकेश्वरवाद के दृष्टिकोण के आधार पर किसी का यह कहना कि वह ईश्वर का भक्त नहीं है, ईश्वर की रचना के दृष्टिकोण के विरूद्ध है। एकेश्वरवाद का पहला क़दम अपने को ईश्वर का प्राणी स्वीकार करना है। अर्थात यह मानना कि हमारा आस्तित्व ईश्वर का प्रदान किया हुआ है। यही दासत्व एंव भक्ति है। दास अर्थात सेवक, दूसरे के स्वामित्व में होना। अतः अगर कोई अपने को मुसलमान और ईश्वर का श्रद्धालू तो कहलवाता है, परन्तु अपने को ईश्वर का सेवक व भक्ति नहीं मानता है तो मानो उसके कथन में स्पष्ट टकराव है। क्यों कि ईश्वर पर विश्वास होने का परिणाम यह है कि हम स्वंय को उसकी सृष्टि और सेवक व भक्ति समझें। इसी कारण समस्त मुसलमान अपनी उत्तम उपासना अर्थात नमाज़ में कहते हैः अशहदो अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह, निसंदेह इस्लामी ईशदूत, ईश्वर के भक्त और संदेशदाता हैं।और यह बात स्वीकृत व सिद्ध है कि मनुष्य के लिए सबसे उत्तम महिमा और स्थान, ईश्वर का सेवक व भक्त होना है। इसी कारण ईश्वर का पवित्र कथन हैःवह ईश्वर (हर दोष से) पवित्र और मुक्त है जिसने अपने सेवक को रातो रात मस्जिदे हराम (ख़ाना-ए-काबा) से मस्जिदे अक़्सा तक की सैर कराई। ईश्वर की भक्ति व उपासना और उसके दासत्व व भक्ति के महत्व को समझाने के लिए क़ुरआन में इस सुंदर शब्द (अब्द) और इसके दूसरे समानार्थ को प्रयोग किया गया है और मनुष्य के लिए उत्तम व श्रेष्ठ श्रेणी को दासत्व व भक्ति माना गया है।ऐ संतुष्टि पाने वाली आत्मा अपने प्रतिपालक व स्वामी की ओर पलट आ (कि) तू उस से संतुष्ट है और वह तुझ से संतुष्ट है, तू मेरे विशेष भक्तों में सम्मिलित हो जा।दूसरा उत्तर धर्मशास्त्र के अनुसार दूसरा उत्तर धर्मशास्त्र के अनुसार यह है कि मनुष्य के स्वतंत्र होने और अनिवार्य कर्तव्यों को स्वीकार करने में अनुकूलता नहीं है के दृष्टिकोण का परिणाम भय, अत्याचार, आतंक और सख़्ती व हानि एंव क्षति है। और यह परिणाम निकालना कि मनुष्य स्वतंत्र है जिस तरह चाहे जीवन व्यवतीत कर सकता है। यद्धपि उसने उस क़ानून को वोट दिया हो परन्तु उसका पालन करना आवश्यक नहीं है। तो ऐसा तो जंगल में भी नहीं होता है क्यों कि वहाँ पर भी पशुओं के जीवन व्यवतीत करने के लिए विशेष नियम होते हैं।अतः जब हम सभ्यता और नागरिकता का दम भरते हैं तो हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि नागरिकता का सबसे पहला स्तंभ नियमों का पालन है, और इस कर्तव्य को स्वीकार न करने से न केवल यह की नई सभ्यता का दावा नहीं किया जा सकता, बल्कि अपने को बर्बरता की सबसे गहरी खाई में गिरा हुआ पाएंगे।दूसरे शब्दों में यह कि मनुष्य की फ़स्ल और मुक़व्विम (मनुष्य
9 नवंबर 2012 - 20:30
समाचार कोड: 363778
यह निश्चित बात है मनुष्य का सामाजिक जीवन विभिन्न मरहलों से गुज़रता है। एक युग में दासता का मुद्दा प्रचलित था और मनुष्य की उन्नति, प्रगति व विकास इसी में समझा जाता था कि कमज़ोर और निर्धन लोग दूसरों की दासता करें और उनकी हर संभव सेवा करें।