मणिपुर और मिजोरम के 'बनी मनाशे' समुदाय के इन आदिवासियों को जायोनी शासन के अधीन मक़बूज़ा फिलिस्तीन ले जाया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की कहानी बेहद चौंकाने वाली है। 1951 में एक सपने के आधार पर खुद को यहूदी मानने वाले इन लोगों को दशकों तक इस्राईल ने स्वीकार नहीं किया, पर आज जब युद्ध के कारण वहां मजदूरों का अकाल पड़ा है, तो अचानक इन 6,000 भारतीयों को बुलाने की तैयारी हो गई है।
हकीकत यह है कि भारत के समृद्ध यहूदी इस्राईल नहीं जा रहे, बल्कि इन गरीब आदिवासियों को वहां फिलिस्तीनी मजदूरों की जगह खेतों, निर्माण कार्यों और टॉयलेट सफाई जैसे कामों में झोंकने की योजना है।
युद्ध के मुहाने पर बसे इन इलाकों में इन्हें सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ भेदभाव और जोखिम मिलने वाला है। भारतीय नागरिकों को ऐसे असुरक्षित माहौल में भेजा जा रहा है जहां उन्हें बराबर की इज्जत तक नहीं मिलेगी। क्या यह मजहबी जुनून है या बेरोजगारी का फायदा उठाकर अपनों को ही आधुनिक गुलामी की ओर धकेलने की साजिश?
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