7 दिसंबर 2020 - 15:28
 क्या ईरान पर हमले के लिए सऊदी अरब ने खोली अपनी वायु सीमा, एक बड़े तूफान से पहले की है यह खामोशी, ईरान की कौन सी शक्ति ने अमरीका की नींद उड़ा दी है? रायुलयौम ने दिये इन सवालों के जवाब

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र रायुल यौम ने इलाके में जारी कई घटनाओं का विश्लेषण करके चौंकाने वाले नतीजे निकाले हैं जो पढ़ने लायक़ है।

आजकल जो लोग सत्ता में जाने के बाद ईरान के परमाणु मामले में जो बाइडन के रुख के बारे में विशेषकर पश्चिमी और अमरीकी मीडिया में विश्लेषण और चर्चाओं पर नज़र रख रहे हैं वह निश्चित रूप से इस प्रकार के कुछ निष्कर्षों पर पहुंच रहे हैं।

पहलाः बाइडन सरकार किसी भी दशा में उस परमाणु समझौते में वापस नहीं लौटेगी जिस पर सन 2015 में हस्ताक्षर किये गये बल्कि वह एक नया संतुलित समझौता चाहती है जिसमें कई नये विषय शामिल हों।

दूसराः बाइडन सरकार ईरान की मिसाइल शक्ति को खत्म करना चाहती है जिसके बल पर ईरान ने हुरमुज़ स्ट्रेट पर 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले अमरीका के अत्याधुनिक ड्रोन विमान " ग्लोबल हॉक" को मार गिराया था और जिस शक्ति को परोक्ष रूप से प्रयोग करते हुए सऊदी अरब के बक़ीक़ और खरीस तेल प्रतिष्ठानों को तबाह कर दिया और एक मिसाइल तो हालिया दिनों में जेद्दा में आरामको कंपनी तक पहुंच गया था कि उसे कोई रोक नहीं पाया।

तीसराः मध्य पूर्व में ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करना जिससे इस्राईल और अरब जगत में उसके घटकों को काफी परेशानी है और इससे आशय, लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में असांरुल्लाह, गज्ज़ा में हमास और इसलामी जेहाद और इराक़ में अलहश्दुश्शाबी हैं। 

 

चौथाः ईरान पर सुरक्षा परिषद द्वारा हथियारों के प्रतिबंध की अवधि को फिर से बढ़ाना जिससे वह नये और आधूनिक हथियार नहीं खरीद पाएगा और न ही दिलचस्पी रखने वाले  तीसरी दुनिया और इलाक़े के देशों को अपने ड्रोन विमान और हथियार न बेच सके।

जो बाइडन ने अपने इस प्रकार के इरादों को न्यूयार्क टाइम्ज से हालिया वार्ता में प्रकट किया है। इस वार्ता में जो बाइडन ने ईरान के मध्यमार्गी धड़े को परमाणु समझौते में अपनी वापसी का आश्वासन दिलाने की भी कोशिश की लेकिन युरोपीय संघ के वर्तमान अध्यक्ष जर्मनी के विदेशमंत्री हाइको मास बाइडन के इस आश्वासन पर यह कह कर पानी फेर दिया कि जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस की सहमति से , पुराने परमाणु समझौते में वापसी का इच्छुक नहीं है बल्कि वह एक नये समझौते के लिए वार्ता का इच्छुक है जिसमें तेहरान को अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को खत्म करना होगा जो इलाक़े के लिए खतरा हैं और उसे इलाके में अपने सैन्य संगठनों से हर प्रकार का संबंध खत्म करना पड़ेगा।

ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों को खत्म करने और मिसाइल कार्यक्रम को रोकने पर आग्रह की अस्ल वजह  यह है कि ईरानी मिसाइलों ने अरब प्रायद्वीप में अमरीकी एन्टी मिसाइल सिस्टम की कमज़ोरी को पूरी तरह से उजागर कर दिया है और अब सीधे रूप से इस्राईल के लिए खतरा बन गयी हैं।

अमरीका और युरोपियों  की परेशानी इस वजह से भी बढ़ रही है कि फरवरी में हुए संसदीय चुनाव में ईरानी संसद में कट्टरपंथियों को बहुमत मिल गया है और संसद पर उनका क़ब्ज़ा है और सभी सर्वे रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि यही धड़ा, अगली जून में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में वापसी करेगा और अगले साल की छमाही के बाद राष्ट्रपति रूहानी और विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ के नेतृत्व वाला वर्तमान सुधारवादी धड़ा, सत्ता में नहीं रहेगा।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के पितामाह कहे जाने वाले वैज्ञानिक मोहसिन फख्रीज़ादे की हत्या के बदले का सब से खतरनाक पहलु, संसद में पारित होने वाले उस क़ानून से सामने गया है जिसमें कहा गया है कि अगर दो महीने के भीतर ईरान पर प्रतिबंध न हटाए गये तो सरकार, यूरेनियम के 20 प्रतिशत संवर्धन, आईएईए के निरीक्षकों के परमाणु प्रतिष्ठानों में प्रवेश  को रोकने और बड़ी शक्तियों के साथ होने वाले परमाणु समझौते के अनुच्छेदों के पालन को रोकने पर प्रतिबद्ध होगी लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ईरान, सैन्य रूप से इस हत्या का बदला नहीं लेगा, बदला ज़रूर लेगा लेकिन शायद फिलहाल टाल दिया गया है जैसा कि हमें प्रतिरोध मोर्चे से बेहद क़रीब एक लेबनानी सूत्र ने बताया है कि ईरान ने, जनरल क़ासिम सुलैमानी की हत्या की वजह से युद्ध  नहीं छेड़ा तो फिर वह उनसे कम महत्व की हस्ती, फख़्रीज़ादे की हत्या की वजह से युद्ध कैसे छेड़ सकता, लेकिन सच्चाई यह है कि कुछ भी हो सकता है।

 

ब्रिटेन की प्रसिद्ध पत्रिका इकॉनोमिस्ट ने शुक्रवार को अपने कवर पेज स्टोरी में कहा है कि अब ईरान के पास संवर्धित यूरेनियम की जो मात्रा है वह परमाणु समझौते में उल्लेखित सीमा से 12 गुना अधिक है जो दो परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त है और यह भी पता चला है कि ईरान ने संवर्धन के  अत्याधुनिक उपकरण और मशीनें भूमिगत परमाणु प्रतिष्ठानों में पहुंचा दी हैं।

सवाल यह है कि क्या हारे हुए ट्रम्प और उनके मित्र, नेतेन्याहू, सच्चाई को स्वीकार करेंगे और बाइडन की सरकार को ईरान के साथ वार्ता की ओर लौटने देंगे जो पहली बात तो यह कि  सुधारवादियों की हार की वजह से पहले से ही नाकाम समझी जा रही है और दूसरी बात यह है कि ईरान का कट्टरपंथी धड़ा किसी भी दशा में बैलिस्टिक मिसाइलों के मामले में पीछे हटले पर तैयार नहीं होगा जिसके परिणाम में ईरान को परमाणु हथियार बनाने के लिए अधिक समय मिल जाएगा जो पश्चिमी देशों की रिपोर्टों के अनुसार बेहद क़रीब है?

हमारे पास जादुई आइना नहीं है जिसमें हम भविष्य देख लें और इन हमें अपने सवालों का जवाब मिल जाए लेकिन कुश्नर की औचक और अस्पष्ट यात्रा के दौरान सऊदी अरब और क़तर के बीच सुलह पर असाधारण आग्रह और सऊदी अरब द्वारा क़तर के विमानों बल्कि शायद ईरान पर हमले के लिए इस्राईली विमानों के लिए अपनी वायु सीमा खोलने जैसी घटनाएं, सब की सब यह बता रही हैं कि हमले की योजना तैयार की जा चुकी है।

इकॉनोमिस्ट की रिपोर्ट भी इसी तरह की अन्य पश्चिमी रिपोर्टों की पुष्टि करती है जिनमें कहा गया है कि अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो और जेयर्ड कुशनर की इलाक़े की यात्रा के दौरान एक खुफिया समझौता हुआ है जिसके तहत इस्राईल की खुफिया एजेन्सी मोसाद और परशियन गल्फ के तटवर्ती देशों की खुफिया एजेन्सियों के बीच, ईरान और उसके समर्थक संगठनों की गतिविधियों के बारे में हर प्रकार की सूचनाओं का आदान प्रदान होगा और वाशिंग्टन में बाइडन द्वारा ईरान के साथ वार्ता की हर कोशिश को नाकाम बनाने के लिए सहयोग किया जाएगा और शायद अन्य कारणों के साथ ही साथ यह भी एक कारण हो जिसके आधार पर ट्रम्प के दामाद की इस यात्रा के उद्देश्यों पर पर्दा पड़ा हुआ है।

कुश्नर की यात्रा, ट्रम्प के ट्वीट्स और क़तर व सऊदी अरब के बीच अचानक ही सुलह तथा बिना कार्यक्रम के ट्रम्प और मिस्र के राष्ट्रपति की टेलीफोनी वार्ता, सब कुछ इस बात का इशारा हो सकता है कि इलाक़े में जो कुछ हो रहा है वह एक बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा है।