समाचार एजेंसी तसनीम ने अरबी-21 के हवाले से एक रिपोर्ट दी है कि, आले सऊद शासन से संबंधित सऊदी अरब के समाचार पत्र अकाज़ के पत्रकार ओसामा यमानी ने पवित्र मस्जिदुल अक़्सा के संबंध में एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि, जिसतरह पवित्र क़ुरआन मस्जिदुल अक़्सा के बारे में बताया गया है उसके दृष्टिगत यह मस्जिद बैतुल मुक़द्दस में नहीं है। ओसामा यमानी ने अपने लिखे लेख के ज़रिए यह दावा किया है कि, केवल इसलिए बहुत से लोग यह विश्वास रखते हैं कि मस्जिदुल अक़्सा फ़िलिस्तीन के बैतुल मुक़्द्दस शहर में है क्योंकि बहुत सी ऐतिहासिक पुस्तकों और पवित्र क़ुरआन के बारे में लिखी गई किताबों में यह बताया गया है कि मस्जिदुल अक़्सा बैतुल मुक़द्दस में है। सऊदी अरब के इस पत्रकार ने दावा किया है कि, जिस मस्जिदुल अक़्सा के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने बताया है वह मस्जिद मक्का और ताएफ़ के रास्ते में स्थित अलजुराना इलाक़े में है न कि अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन के बैतुल मुक़द्दस शहर में।

सऊदी अरब के पत्रकार ने लेख के ज़रिए अपने इस्राईली आक़ाओं को ख़ुश करने के लिए आगे लिखा है कि, मस्जिदुल अक़्सा अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में नहीं है। इसी तरह जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स) और ख़लीफ़ाओं के दौर में भी ऐसा कोई नाम नहीं था। सऊदी पत्रकार ने लिखा है कि, बैतुल मुक़द्दस एक शहर है जबकि मस्जिदुल अक़्सा केवल एक मस्जिद है। यमानी ने अपने लंबे-चौड़े लेख में जहां यह झूठे दावों से यह साबित करने की पूरी कोशिश की है कि मस्जिदुल अक़्सा बैतुल मुक़द्दस में नहीं है वहीं यह भी लिखा है कि मस्जिदुल अक़्सा मुसलमानों का पहला क़िब्ला भी नहीं है। उसने दावा किया कि, पूर्व के इतिहास के जानकारों के बीच भी बैतुल मुक़द्दस में मुसलमानों के पहले क़िब्ले के होने को लेकर एक दृष्टिकोण नहीं था। सऊदी पत्रकार ने अपने लेख में लिखा है कि, अब्दुल मलिक मरवान ने वर्ष 691 में मस्जिदे सख़रा के गुंबद की बुनियाद रखी थी। क्योंकि उस समय मक्का में हज पर प्रतिबंध लगा हुआ था और इसलिए अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने मस्जिदे सख़रा का बनाया ताकि लोग मक्के के बजाए वहां जा सकें।

सऊदी अरब के पत्रकार यमानी ने अपने लेख के अंत में लिखा है कि, इतिहास और इतिहास के जानकारों की लिखी बातों से जो हमे नतीजा मिलता है वह यह दर्शाता है कि यह सब राजनीतिक कारणों की वजह से हुआ था और राजनीतिक लाभ के लिए उस समय यह सब किया गया था। ओसामा यमानी के लेख के बाद से एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। क्योंकि वह पहला सऊदी लेखक नहीं है कि जिसने अपने लेख के ज़रिए यह कोशिश की है कि बैतुल मुक़्द्दस और मस्जिदुल अक़्सा का इंकार करे। जानकारों का मानना है कि यमानी द्वारा लिखा गया लेख केवल सऊदी अरब और इस्राईल के बीच आधिकारिक तौर पर संबंध के एलान के लिए भूमिका बनाना है। आले सऊद अपने शासन को बचाए रखने और अपने हितों को साधने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं इसीलिए उन्हें फ़िलिस्तीन, बैतुल मुक़्ददस और मस्जिदुल अक़सा को लेकर कोई दर्द नहीं है। यमानी द्वारा लिखा गया लेख सऊदी अरब सहित पूरी दुनिया के मुसलमानों के ध्यान को भटकाना और आज़माना बताया जा रहा है, ताकि रियाज़ और तेलअवीव के बीच जब आधिकारिक संबंधों का एलान हो तो आम मुसलमान मस्जिदुल अक़्सा की वास्तविक्ता के बारे में ही सोचते रह जाएं और ध्यान मुसलमानों और फ़िलिस्तीनियों के साथ ग़द्दारी करने वालों की ओर न जाए।