ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई के वरिष्ठ सलाहकार अली शमख़ानी ने कहा कि अमेरिका का ईरान के प्रति विरोधाभासी रवैया उसकी "अधिकतम दबाव" नीति का हिस्सा है। इससे यह साबित होता है कि अमेरिका सच में बातचीत नहीं करना चाहता है।
उन्होंने कहा कि एक तरफ अमेरिका बातचीत की पेशकश करता है, लेकिन दूसरी तरफ ईरान पर और सख्त पाबंदियाँ लगा रहा है। उन्होंने साफ़ किया कि बातचीत का मकसद राष्ट्रीय हितों की रक्षा होना चाहिए, न कि आंतरिक समस्याओं का समाधान खोजना।
शमखानी ने कहा कि बातचीत तभी मायने रखती है जब दोनों पक्ष किसी स्थायी समझौते के लिए ईमानदारी से आगे बढ़ें। लेकिन "अनुभव बताता है कि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं पर टिकता नहीं है।"
उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) को फिर से बहाल करने के लिए ईरान की प्रतिबद्धता दोहराई, जबकि अमेरिका खुद इस समझौते से पीछे हट गया था। उन्होंने कहा कि ईरान ने कभी वार्ता से इनकार नहीं किया, बल्कि अमेरिका और यूरोप अपने वादों को पूरा करने में असफल रहे। अब उन्हें ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने चाहिए।
शमखानी ने अमेरिका की "अविश्वसनीय" वार्ता की पेशकश की आलोचना की और कहा कि बातचीत तभी संभव होगी जब यूरोपीय देश भी तार्किक और सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाएँ।
उन्होंने कहा कि किसी भी बातचीत में ईरान सिर्फ प्रतिबंध हटाने पर ध्यान देगा, न कि किसी सतही और बेकार समझौते पर।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी समझौता या वार्ता ईरान की आर्थिक समस्याओं का हल नहीं हो सकता। 2015 के समझौते का अनुभव और अमेरिका-यूरोप की नीतियाँ यह दिखा चुकी हैं कि सिर्फ बातचीत पर निर्भर रहना फायदेमंद नहीं होगा।
शमखानी ने कहा कि ईरान को अपनी आंतरिक व्यवस्था को मजबूत करना होगा और बाहरी दबाव पर निर्भरता कम करनी होगी। तभी ईरान किसी भी वार्ता में मज़बूती से शामिल हो सकेगा, न कि मज़बूरी में।
