इस मुलाक़ात में रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने रूस और चीन के बीच सहयोग और संबंधों को एक्कीसवीं सदी में दूसरे देशों के लिए एक उदाहरण क़रार दिया और उन्होंने कहा कि रूस और चीन संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद, शंघाई सहयोग संघठन, ब्रिक्स और अन्य संगठनों में एक दूसर के साथ खड़े हैं और अपनी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभा रहे हैं।
शीत युद्ध के बाद रूस और चीन के संबंध, संयुक्त चुनौतियों और हितों के मद्देनज़र विस्तृत होते रहे हैं। ख़ास तौर पर इंडोपेसिफ़िक इलाक़े में अमरीका की नीतियां और कार्यवाहियां, आज मास्को और बीजिंग के लिए एक बड़ी चुनौती है। इस संदर्भ में पुतिन और जिनपिंग ने अमरीका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच नए सैन्य गठबंधन के गठन पर चिंता जताई और इसे विश्व में असंतुलन का कारण बताया। दोनों ही नेताओं का कहना था कि इस तरह का कोई भी सुरक्षा समझौता, रणनीतिक क्षेत्र में तनाव में वृद्धि का कारण बनेगा। मास्को और बीजिंग का मानना है कि अमरीका, इस तरह के गठजोड़ों के ज़रिए, इंडोपेसिफ़िक के वर्तमान समीकरणों को बदलना चाहता है।
रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सलाहकार यूरी ओशाकोव का कहना है कि मोटे तौर पर इस तरह का कोई भी सैन्य गठबंधन, क्षेत्र में तनाव में वृद्धि का कारण बनेगा।
ग़ौरतलब है कि जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद, वाशिंगटन ने मास्को और बीजिंग को लेकर काफ़ी कड़ा रवैया अपना रखा है। अमरीका और रूस के बीच क्षेत्रीय संकंटों को लेकर काफ़ी गहरे मतभेद हैं और दोनों ही देशों के अधिकारी, एक दूसरे पर चुनावों में हस्तक्षेप और साइबर हमलों में शामिल रहने के आरोप लगाते रहे हैं।
चीन और रूस इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अमरीका और पश्चिम की धौंस जमाने वाली नीतियों से बचने के लिए हर स्तर पर दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग ज़रूरी है। यही वजह है कि मास्को और बीजिंग संयुक्त सैन्य अभ्यासों के अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में एक दूसरे से व्यापक सहयोग कर रहे हैं।