5 जुलाई 2021 - 16:40
ईरान के साथ परमाणु समझौते को लेकर अमरीका का विरोध करना ऑप्शन नहीं

(इस्राईली अख़बार हारेत्ज़ के पूर्व संपादक व लेखक अकीवा एल्डर के विचार) ईरान के साथ समझौते के रास्ते में रोड़ा अटकाना, इस्राईल के लिए भयानक होगा

ईरान-अमरीका के बीच संभावित परमाणु समझौते के संबंध में इस्राईल की नयी सरकार के सामने रणनैतिक कश्मकश पैदा हो गयी है। उसके सामने दो ऑप्शन हैः पूर्व प्रधान मंत्री नेतनयाहू की नीति को अपनाना जो ईरान के साथ किसी भी समझौते को ख़ारिज करते हैं जिससे थोड़ी बहुत पाबंदियां हटें, या फिर “जिसे आप हरा नहीं सकते, उनके साथ हो जाइये” वाली नीति अपनाते हुए बाइडेन सरकार के साथ सहयोग करे।

इस्राईल के विदेश मंत्री याइर लपीद ने 27 जून को अपने अमरीकी समकक्ष ऐन्टोनी ब्लिंकन के साथ पहली मिटिंग में इस बात का इशारा दिया कि नई सरकार किस दिशा में बढ़ सकती है। लपीद ने कहाः “हमारा मानना है कि मतभेदों पर सीधी और पेशावराना बातचीत के ज़रिए चर्चा होनी चाहिए, न कि प्रेस कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए।” यह, 2015 के परमाणु समझौते के ख़िलाफ़ नेतनयाहू के आक्रामक प्रचार के बिल्कुल विपरीत होगा, जब नेतनयाहू ने ओबामा सरकार के इस समझौते पर मोहर लगने से पहले, विचार विमर्श में भाग लेने की पेशकश को ठुकरा दिया था।

नेतनयाहू ने ओबामा को बताए बिना 2015 के समझौते के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस को इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम हुए। समझौते पर दस्तख़त हो गए। नेतनयाहू ने बाद में पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और रिपब्लिन्स के साथ बनाए गहरे संबंध का फ़ायदा उठाया और 2018 में अमरीका के इस समझौते से बाहर निकलने में प्रभावी रोल निभाया। इससे इस्राईल को क्या मिला, सिवाए इस समझौते पर दस्तख़त करने वाले रूस, चीन, ब्रिटेन और फ़्रांस के क्रोध और कुंठा केॽ

वाइट हाउस पहुंचने से कुछ हफ़्ता पहले, दिसंबर 2020 में इस सवाल का, चुने गए राष्ट्रपति बाइडेन ने जवाब दिया, यह एलान करते हुए कि ईरान से समझौते का विरोध करने का नतीजा, विरोधियों की इच्छा के ख़िलाफ़ निकला।

जनवरी 2020 में बाइडेन की ओर से ट्रम्प की, ईरान के साथ समझौते से अमरीका को बाहर निकालने की आलोचना को, नेतनयाहू की भी आलोचना के रूप में देखना चाहिए।

नेतनयाहू उस क्षेत्र में अपनी भारी नाकामी को नहीं मान रहे है जिसके लिए वह बरसों ख़ुद को ‘मिस्टर सेक्युरिटी’ के नाम से मशहूर करते रहे। अब वह केनेस्ट में विपक्ष की बेंच से ईरान के साथ परमाणु समझौते को फिर से पटरी पर लाने की अमरीकी कोशिश के ख़िलाफ़ उकसाते हैं। वह प्रधान मंत्री नेफ़्ताली बेनेत और लपीद पर पैनी नज़र रख हुए हैं, जिन पर उन्होंने, ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी सैन्य हमले की अमरीका को पहले से सूचना देने का वादा करके, इस्राईल के सुरक्षा हितों को नुक़सान पहुंचाने का इल्ज़ाम लगाया है।

अपने दफ़्तर में पहले दिन लपीद ने कहा कि डेमोक्रेट्स के साथ इस्राईल के संबंध को बेहतर बनाना उनका पहला काम है। उन्होंने 27 जून को रोम में ब्लिंकन के साथ बैठक में यही किया। लपीद ने ब्लिंकन से कहाः “पिछले कुछ बरसों के दौरान, ग़लतियां हुयीं। इस्राईल की द्विदलीय पोज़ीशन को नुक़सान पहुंचा। हम उन ग़लतियों को सुधारेंगे।”

ईरान-अमरीका बातचीत में कामयाबी, बेनेट को दो में एक को चुनने का फ़ैसला लेने पर मजबूर कर देगी। एक “धारे के साथ बहने” या अमरीका और दूसरी बड़ी ताक़तों तथा घर पर लपीद और सरकार में शामिल सेंटर-लेफ़्ट पार्टनर्ज़ के साथ दोहरी मुश्किल मोल लेने के बीच किसी एक को चुनना होगा।

नेतनयाहू की दोहरी नाकामी-ईरान के परमाणु प्रोग्राम में तेज़ी और डेमोक्रेट्स के साथ ख़राब संबंध का संकट- से बेनेट को सबक़ लेना चाहिए। इस्राईल अमरीका को हरा नहीं सकता। अगर जीत भी जाए तब भी नतीजा नुक़सान है।

(साभार अल-जज़ीराः इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। पार्स टुडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं)