9 अक्टूबर 2020 - 12:50
ग़ैर क़ानूनी इस्राईली शासन से दोस्ती की तैयारी में सऊदी अरब के सरकारी प्रोपैगंडे पर हम यही कहेंगे कि हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं मगर आप बहुत कुछ हार जाएंगे, नए दोस्त आपको मुबारक!

जुलाई 2006 की बात है जब लेबनान पर इस्राईल के हमले शुरू हुए लगभग आठ दिन गुज़र गए थे तब तत्कालीन सऊदी विदेश मंत्री सऊदुल फ़ैसल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने वाशिंग्टन का दौरा किया और तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश से मुलाक़ात की।

हालांकि वह रविवार का दिन था मगर असामान्य रूप से वाइट हाउस के दरवाज़े इस प्रतिनिधिमंडल के लिए खोले गए। इस प्रतिनिधिमंडल में सऊदुल फ़ैसल के अलावा सऊदी अरब के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अमरीका में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत बंदर बिन सुलतान और पूर्व सऊदी इंटेलीजेन्स चीफ़ तुर्की फ़ैसल शामिल थे।

इस मुलाक़ात के एक दिन बाद तीनों राजकुमारों ने अपना विशेष दूत लंदन भेजा और वहां के मीडिया के माध्यम से जनमत को यह संदेश दिलवाया कि सऊदी प्रतिनिधिमंडल ने अमरीकी राष्ट्रपति से यह कहा है कि सऊदी अरब और इस्राईल एक ही पेज पर मौजूद हैं और यह कि जब जून 1967 का युद्ध छिड़ गया था तो सऊदी अरब ने इस्राईल की ही मदद से मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुन्नासिर को हराया था और 2003 में अपने दूसरे सबसे बड़े दुशमन सद्दाम की सरकार का तख़्ता उलटा और अब तीसरे बड़े दुशमन यानी हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ जंग शुरू हो गई है।

यह संदेश बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़ नाइट के आरकाइव में मौजूद हैं। उस रात उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था जिसमें इस संदेश और उसके अर्थों पर चर्चा हो रही थी। मैं इस घटना को आज इस लिए याद कर रहा हूं कि बंदर बिन सुलतान ने अलअरबिया टीवी चैनल के माध्यम से फ़िलिस्तीनी जनता और नेतृत्व पर बहुत तेज़ हमला किया है।

इस हमले में उन्होंने क्या कहा इस बारे में मैं इस लेख में कोई बहस नहीं करूंगा मगर मैं इसके असली लक्ष्यों के बारे में ज़रूर चर्चा करना चाहूंगा। मेरा उद्देश्य फ़िलिस्तीनी नेतृत्व का बचाव करना नहीं है क्योंकि मैं तो खुद इस नेतृत्व के निकम्मेपन की वजह से उसके बड़े आलोचकों में रहा हूं और इसलिए भी कि उसने इस्राईल के साथ ओस्लो समझौता करके त्रासदीजनक ग़लती की थी।

सबसे पहले तो मैं यह कहूंगा कि जो हमला बंदर बिन सुलतान ने किया है और सरकारी टीवी चैनल के माध्यम से किया है उसे निश्चित रूप से सऊदी सरकार की स्वीकृति मिल चुकी है। यूं भी सऊदी अरब हालिया समय में इस्राईल से दोस्ती की राह साफ़ करने वाले कार्यक्रम बार बार दिखा रहा है। फ़िलिस्तीनियों पर इस प्रकार के हमले हर उस देश ने किए हैं जिसने इस्राईल से दोस्ती की योजना बनाई। इसमें जार्डन, मिस्र, बहरैन और इमारात सब एक समान हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब के इस प्रकार के स्टैंड से फ़िलिस्तीन मुद्दे को नुक़सान पहुंचेगा क्योंकि सऊदी अरब एक बड़ा देश है और इस्लामी व अरब जगत में उसकी मज़बूत पोज़ीशन है। सऊदी अरब लंबे समय से फ़िलिस्तीन का समर्थन करता रहा है। अकतूबर 1973 की जंग में पूर्व सऊदी नरेश किंग फ़ैसल ने इस्राईल को तेल से वंचित करने का साहसिक फ़ैसला किया था और इसकी क़ीमत चुकाने में उनकी जान भी चली गई थी। मगर यह तय है कि इस प्रकार के फ़ैसलों से ख़ुद सऊदी अरब की पोज़ीशन को जो नुक़सान पहुंचेगा वह बहुत बड़ा होगा।

बंदर बिन सुलतान के इंटरव्यू में एक महत्वपूर्ण बिंदु का उल्लेख था जिसके बारे में बात करना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि फ़िलिस्तीनियों के अब दो ही दोस्त रह गए हैं ईरान और तुर्की। बंदर बिन सुलतान की यह बात ग़लत है। अधिकांश अरब सरकारें आज भी फ़िलिस्तीनियों के साथ हैं इसका एक उदाहरण यही है कि नकारात्मक स्टैंड लेने के कारण अरब लीग की अध्यक्षता स्वीकार करने से फ़िलिस्तीन ने इंकार किया तो अब तक छह अरब देश इस संघ की अध्यक्षता ठुकरा चुके हैं। हमारी समझ में यह बात भी नहीं आई कि दो बड़े इस्लामी देशों ईरान और तुर्की की दोस्ती को बंदर बिन सुलतान इतना बुरा क्यों समझते हैं। क्या जब सीरिया के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा गया था तो उस समय यही तुर्की सऊदी अरब का बेहद क़रीबी स्ट्रैटेजिक पार्टनर नहीं बन गया था? क्या एक ज़माने में ईरान के राष्ट्रपति हाशेमी रफ़संजानी सऊदी अरब के बेहद सम्मानित मेहमान नहीं हुआ करते थे? दूसरी बात यह है कि यह दोनों ही इस्लामी देश बहुत प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र हैं। यह दोनों देश फ़िलिस्तीनी जनता का खुलकर साथ देते हैं। ईरान ने फ़िलिस्तीनियों को मिसाइल तकनीक देकर इतना मज़बूत कर दिया कि वह इस्राईल का डटकर मुक़ाबला करते हैं और जब चाहते हैं सारे इस्राईलियों को भूमिगत ठिकानों में जाकर शरण लेने पर मजबूर कर देते हैं।

हो सकता है कि कुछ अरब सरकारों ने फ़िलिस्तीनी जनता का साथ छोड़ दिया हो मगर यह तय है कि अरब जनता पूरी तरह फ़िलिस्तीनियों के साथ खड़ी है। इस्राईल से पुराने ख़ुफ़िया रिश्ते रखने वाली अरब सरकारों को इस्राईल की दोस्ती मुबारक हो वह इस्राईल की विस्तारवादी योजना का ख़ूब समर्थन करें जिसके निशाने पर पूरा अरब जगत यहां तक कि मक्का और मदीना भी हैं।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार