9 अक्टूबर 2020 - 12:43
अमरीका के नए प्रतिबंध, कितनी कामयाब हो पाएगी अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम दिनों में ट्रम्प की ईरान विरोधी कोशिशें?

अमरीका ने दो साल पहले परमाणु समझौते से निकलने के बाद ईरान पर अधिकतम दबाव डालने की नीति अपना रखी है और वह हर कुछ दिन बाद ईरान पर कोई नया प्रतिबंध लगा देता है। गुरुवार को भी उसने ईरान के 18 बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को प्रतिबंधित कर दिया।

अमरीकी वित्त मंत्रालय ने गुरूवार की शाम ईरान के ख़िलाफ़ नए प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए 18 बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को प्रतिबंधों की अपनी सूची में शामिल कर लिया। अमरीका के वित्तमंत्री स्टीवन मनुचिन ने इन प्रतिबंधों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि अवैध रूप से डाॅलरों तक ईरान की पहुंच को रोकने के लिए यह प्रतिबंध लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रतिबंध तब तक जारी रहेंगे जब तक ईरान, अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद नहीं कर देता। विशेषज्ञों का कहना है कि अमरीका के नए प्रतिबंध, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से ईरान के बैंकिंग सिस्टम का संपर्क बड़ी हद तक टूट जाने का कारण बनेगा।

 

अमरीका के इन प्रतिबंधों से ईरान की जनता की समस्याओं में और अधिक बढ़ोतरी होगी लेकिन ट्रम्प सरकार का दावा है कि मानवता प्रेमी मामलों में कुछ छूट दी जाएगी। अमरीकी सरकार के दावों के विपरीत यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि यह प्रतिबंध लगाने का अस्ल उद्देश्य ईरान को किसी भी तरह का सामान ख़रीदने से रोकना है, चाहे वह दवाएं हों, याद्य पदार्थ हों या फिर बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें हों ताकि ईरानी जनता पर अधिक से अधिक दबाव डाला जा सके। इसका लक्ष्य भी साफ़ है कि ईरानी जनता दबाव से तंग आ कर सरकार के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हो।

 

ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने अमरीका के नए प्रतिबंधों पर प्रतिक्रिया जताते हुए ट्वीट किया है कि "यह कोरोना वायरस के फैलाव के दौरान खाद्य पदार्थों और दवाओं का मूल्य चुकाने के बाक़ी बचे चैनलों को भी ध्वस्त करने की कोशिश है।" तेहरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की लड़ाई में नाकाम हो जाने के बाद ट्रम्प कोशिश कर रहे हैं कि ईरान में किसी भी प्रकार का मानवता प्रेमी सामान न पहुंचने दें। अमरीका का इरादा है कि इन नए प्रतिबंधों के ज़रिए पहले चरण में उन गिने-चुने आर्थिक चैनलों को भी बंद कर दे जिन्हें ईरान दुनिया के साथ लेन-देन के लिए इस्तेमाल करता है। उसका दूसरा लक्ष्य यह है कि इस तरह के कड़े प्रतिबंध लगा कर नवम्बर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन को, चुनाव जीतने की स्थिति में परमाणु समझौते में लौटने न दे।

 

अमरीका के इन प्रतिबंधों के समर्थक कुछ अमरीकी सांसदों का कहना है कि इन प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान को वार्ता की मेज़ पर आने के लिए मजबूर करना है। अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने ईरान के 18 बैंकों और वित्तीय संस्थाओं पर लगाए गए प्रतिबंध की तरफ़ इशारा करते हुए कहा है कि ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की लड़ाई जारी रहेगी, यहां तक कि तेहरान, वार्ता में रुचि प्रकट कर दे। यह ऐसी स्थिति में है कि जब ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की अमरीका की नीति पूरी तरह फ़ेल हो चुकी है और ईरान  को वार्ता की मेज़ पर आने पर मजबूर करने की ट्रम्प सरकार की शत्रुतापूर्ण नीतियों का भी कुछ असर नहीं पड़ेगा।

 

ट्रम्प ने वादा किया था कि वह परमाणु समझौते से निकल कर और ईरान पर अधिकतम दबाव डाल कर उसे "एक बेहतर समझौते" तक पहुंचने के लिए वार्ता पर मजबूर कर देंगे। जबकि उनके इस वादे को दो साल से अधिक समय हो गया है और वाॅशिंग्टन अब भी अपने लक्ष्य में नाकाम है। ट्रम्प के आलोचक उन पर ईरान के संबंध में कोई स्पष्ट रणनीति न होने, तनाव को अकारण बढ़ाने और अपने घटकों से वाॅशिंग्टन का रास्ता अलग करने का आरोप लगाते हैं। इसी के साथ यह बात भी पूरी तरह से स्पष्ट है कि नए प्रतिबंधों के कारण ईरान को मानवता प्रेमी और बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें हासिल करने में पहले से अधिक कठिनाई होगी और यह मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है। अमरीका ने इसी तरह ईरान में अशांति उत्पन्न करके सरकार और व्यवस्था को गिराने की भी कोशिश की है लेकिन अमरीकियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे ईरानी जनता को सही ढंग से नहीं पहचानते। ईरान की जनता ने हमेशा यही सिद्ध किया है कि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मानने वाली है, वह सिर तो कटा सकती है लेकिन अत्याचार व अन्याय के सामने सिर नहीं झुका सकती।