आज़रबाइजान और आर्मीनिया ने दो दशक से ज़्यादा शांति का मुंह नहीं देखा लेकिन इन झड़पों की शुरुआत के बारे में यह कहा जा रहा है कि क़ाराबाग़ झड़पों में इस्राईल की मुख्य भूमिका है और वह क्षेत्र को हमेशा नये युद्ध की आग में झोंकने के प्रयास में रहता है।
स्टॉकहोम पीस रिसर्च सेन्टर ने फ़ाश किया है कि इस्राईल 2017 से 2019 के बीच तीन साल तक आज़रबाइजान को सबसे अधिक हथियार बेचने वाला शासन रहा है और यह मामला नब्बे के दशक में इस्राईल और बाकू के बीच राजनैतिक संबंधों की ओर पलटता है।
ज़ायोनी शासन ने आर्मीनिया के साथ भी संबंधों को बढ़ाने का प्रयास किया यहां तक कि ईरवान ने कुछ महीने पहले ही इस्राईल में अपना दूतावास खोल दिया।
लेकिन मामला यहां पर इस्राईल के हित का है और इस्राईल का हित यह है कि वह अपने शक्तिशाली घटक आज़रबाइजान की रक्षा करे और इसी परिधि में उसने आज़रबाइजान को हथियारों से भर दिया और अनेक प्रकार के हथियार निर्यात किए ताकि सैन्य दृष्टि से आज़रबाइजान का पलड़ा भारी रहे। इस्राईल की इस हरकत से ईरवान भड़क उठा और ईरवान ने इस्राईल से अपना राजदूत बुला लिया जबकि तीन सप्ताह पहले ही ईरवान ने इस्राईल में अपना नया राजदूत भेजा था।
स्पष्ट है कि इस्राईली अधिकारी दोनों देशों के बीच जंग का तमाशा देख रहे हैं क्योंकि इस तरह से झड़पें जारी रहने से इस्राईल के हित ही पूरे होते हैं किन्तु क्षेत्र के कुछ महत्वपूर्ण देशों ने आज़रबाइजान और आर्मीनिया के बीच युद्ध में इस्राईल की भूमिका से पर्दा उठाया है और इससे इस्राईल का काम कठिन हो गया है।
यही वजह से है कि इस्राईल के राष्ट्रपति रियवून रियोलीन, आर्मीनिया के राष्ट्रपति के सामने औचित्य पेश करने पर मजबूर हुए और निराशाजनक प्रयास करते हुए उन्होंने कहा कि इस्राईल द्वारा आज़रबाइजान का हथियारों द्वारा समर्थन, आर्मीनिया से मुक़ाबले के लिए नहीं है जबकि आज़रबाइजान की सेना क़ाराबाग़ झड़पों में धड़ल्ले से इस्राईल के हथियारों का प्रयोग कर रही है।
इस्राईली राष्ट्रपति ने इस्राईल द्वारा आज़रबाइजान गणराज्य के हथियार के समर्थन पर ईरवान को मानवता प्रेमी सहायता का सुझाव दिया और इस तरह से उन्होंने इस्राईल के विध्वंसक बर्ताव और उसकी हित साधने की कार्यवाहियों से पर्दा उठा दिया।
अब यहां पर यह सवाल पैदा होता है कि युद्धरत पक्षों से अपने संबंधों को जारी रखने के पीछे इस्राईल की क्या चाल है?
इसके जवाब में कहना चाहिए कि क्षेत्र में हर झड़प और युद्ध इस्राईल के हित में है और यही चीज़ अरब देशों के बीच भी करने के प्रयास में है ताकि अरबों को आपस में भिड़ाकर और एक दूसरे को आपस में लड़का अपना अस्तित्व बचाए रखे क्योंकि झड़पों और विवादों की वजह से देश अपने आपसी विवादों में भी उलझे रहें और यही चीज़ हम बाकू और ईरवान के बीच युद्ध में देख रहे हैं।
दूसरा विषय यह है कि इस्राईल इस प्रयास में है कि हर वह युद्ध शुरु करने के प्रयास में है जो ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डाल दे और यही वजह है कि कुछ अरब देशों के साथ संबंधों को समान्य बनाने के बहाने वह ईरान के पड़ोसी देशों में पैठ बनाने के प्रयास में है।
इस्राईल की यह भी कोशिश है कि वह ईरान की उत्तरी सीमाओं को अशांत कर दे ताकि क़ाराबाग़ झड़पें, ईरान की सुरक्षा को ख़तरे में डालने के लिए इस्राईल के लिए बेहतरीन अवसर बन जाए।
क़ाराबाग़ झड़पों के बारे में ईरान का दृष्टिकोण खुला और स्पष्ट है और उसने आरंभ से ही कहा है कि विवाद का कोई सैन्य समाधान नहीं है और वार्ता द्वारा समस्याओं को सुलझाया जाए।
तेहरान ने खुले शब्दों में कह दिया है कि वह अपनी सीमाओं के निकट झड़पों को सहन नहीं करेगा। ईरान का यह संदेश उन लोगों के लिए साफ़ है जो क़ाराबाग़ झड़पों की आग भड़काने और इन झड़पों से अपने हित साधने के प्रयास कर रहे हैं।