यह बात पूरी तरह से स्पष्ट थी कि इमारात व बहरैन के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह बिन ज़ायद और अब्दुल लतीफ़ ज़य्यानी, अपने अमरीकी रिंग मास्टर के इशारों पर काम कर रहे थे। इसी तरह यह भी स्पष्ट था कि जो कुछ वाइट हाउस में हुआ वह ट्रम्प के चुनावी प्रचार के अलावा कुछ नहीं था जिन्हें अपनी सरकार के कमज़ोर क्रियाकलाप, अपने झूठों और राजनैतिक व नैतिक स्कैंडलों के कारण लोकप्रियता में भारी कमी का सामना है। इसी लिए सभी चुनावी सर्वेक्षणों में उन्हें उनके डेमोक्रेट प्रत्याशी जो बाइडन से पीछे बताया जा रहा है। यही कारण है कि ट्रम्प को हर वह काम करना है जो वे कर सकते हैं लेकिन उनके पास ज़ायद के बेटों और ख़लीफ़ा के बेटों के अलावा कोई है ही नहीं, इसी लिए उन्होंने उन्हें वाइट हाउस में तलब कर लिया। वे भी दुम हिलाते हुए पहुंच गए और समझौते पर दस्तख़त कर दिए। उन्होंने ज़मीर, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान रखने वाले किसी भी इंसान के विपरीत, अपनी मूर्खतापूर्ण मुस्कानों से अपने संबंध में होने वाले अपमानजनक लेन-देन पर ख़ुशी प्रकट की।
यह बात भी पूरी तरह से स्पष्ट थी कि ट्रम्प ने ज़ायद के बेटों और ख़लीफ़ा के बेटों को अपने सर्कस के लिए जोकरों के रूप में चुना है ताकि शायद वे निराश और कोरोना से पीड़ित अमरीकियों को हंसा सकें। अलबत्ता अपने अमरीकी आक़ा के लिए ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों की सेवाएं जितनी भी हों, अमरीका की वास्तविक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा जो कोरोना, नस्लवाद, आग, बेरोज़गारी और राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक संकटों में घिरा हुआ है।
शर्मनाक समझौतों पर हस्ताक्षर के कार्यक्रम में, जो वास्तव में ट्रम्प के चुनाव प्रचार का कार्यक्रम था, सबसे बड़ी हार ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों को हुई है और अगले चरण में सऊद के बेटे हैं जबकि ट्रम्प को होने वाला नुक़सान, चुनाव में उनकी हार और कुछ भेड़ों की बलि से ज़्यादा नहीं होगा। इसी तरह नेतनयाहू को होने वाला नुक़सान ज़्यादा से ज़्यादा यही होगा कि वे जेल की सलाख़ों के पीछे पहुंच जाएंगे लेकिन लोक-परलोक की फ़ज़ीहत, ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों के नसीब में लिख दी गई है और इतिहास, अरब व इस्लामी राष्ट्रों और दुनिया के सभी स्वतंत्र लोगों की धिक्कार व घृणा से वे अब कभी भी अपना दामन बचा नहीं पाएंगे।