एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए दोनों पड़ोसी देश, दशकों से गोली नहीं चलाने के नियम पर अमल करते चले आ रहे थे। यहां तक कि जून में हुई हाथापाई में लाठियों और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई। लेकिन पिछले हफ़्ते दोनों ओर से बंदूक़े तन गईं और फ़ायरिंग हुई, जिसके लिए दोनों ही देश एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।

लद्दाख़ में भारत को जहां नई उभरती हुई महाशक्ति का सामना है, वहीं अपने पारंपरिक विरोधी पाकिस्तान पर भी नज़र रखनी होगी। चीन, भारत से तीन गुना ज़्यादा अपनी रक्षा पर ख़र्च कर रहा है और तकनीक से लाभ उठाने में भी कहीं आगे है। पाकिस्तान उसका निकटतम सहयोगी है। वहीं सक्के का दूसरा रूख़ यह है कि भारत को उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संघर्ष में अच्छा अनुभव है। दूसरी ओर अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से उसके संबंधों में विस्तार हो रहा है।
भारत, आधुनिक हथियारों के लिए अमरीका और यूरोप की तरफ़ देख रहा है और उसने फ़्रांस से रफ़ाएल जेट्स और अमरीका से अपाचे हेलिकॉप्टरों की ख़रीदारी की है।
यह सब कहने और सुनने में अच्छा लग सकता है, लेकिन जहां तक वास्तविक सैन्य गठबंधन की बात है, इस सहयोग में ऐसा दूर दूर तक कुछ नहीं है। भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की दोस्ती वास्तविकता से कहीं ज़्यादा एक इच्छा है।
चीन विरोधी इस महत्वाकांक्षी गठबंधन के रास्ते में कई बड़ी रुकावटें हैं। उनमें से सबसे बड़ी रुकावट, ख़ुद विवादास्पद भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के दृष्टिकोण से, लोकतांत्रिक देशों के लिए एक साथ काम करना और चीन के मुक़ाबले में संतुलन की स्थापना करना, एक सही क़दम है, लेकिन जहां तक लोकतंत्र की बात आती है, पश्चिम और दुनिया भर में कई लोग मोदी को एक अभिशाप के रूप में देखते हैं।

भारत में अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों के साथ मोदी सरकार के भेदभाव वाले रवैये को लेकर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब उनके चेहरे से नक़ाब हटता जा रहा है। पश्चिम में भी इस पर चर्चा होने लगी है। इसलिए चीन के मुक़ाबले में भारत को अगर पश्चिम और बाक़ी दुनिया की ज़रूरत है तो मोदी को अपनी उदारवादी छवि बनानी होगी और देश को एक बार फिर लोकतंत्र की पटरी पर वापस लाना होगा।
पश्चिम के मेनस्ट्रीम मीडिया का भी मानना है कि भारत में लोकतंत्र गंभीर संकट में है या मर रहा है। उसका मानना है कि मोदी के शासनकाल में भारत का लोकतंत्र एक फासीवादी लोकतंत्र है जो नाज़ी जर्मनी की राह पर चल रहा है। कुछ का यह भी तर्क है कि मोदी हिटलर से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि भारत में मुसलमानों की स्थिति, नाज़ी जर्मनी में यहूदियों की स्थिति से भी ज़्यादा बदतर है।
इसी तरह से मोदी सरकार पर विपक्ष को कमज़ोर करने, विपक्षी नेताओं को डराने-धमकाने और उन्हें जेलों में डालने, मीडिया को निंयत्रित करने, देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने और जानबूझकर ग़रीब विरोधी नीतियां अपनाने जैसे गंभीर आरोप हैं।
यह कोई मामूली आरोप नहीं हैं, ख़ास तौर पर एक ऐसे देश के लिए जो चीन जैसी शक्ति का मुक़ाबला करने के लिए विश्व समुदाय की ओर देख रहा है।
जहां तक अमरीका की बात है, मोदी ने ट्रम्प प्रशासन के साथ अच्छा ताल-मेल बना रखा है, लेकिन अगर नवम्बर के चुनाव में बाइडन जीत हासिल करते हैं, तो निश्चित रूप से यह ताल-मेल गड़बड़ा जाएगा, क्योंकि जो बाइडन और उनकी सहयोगी ने मोदी की नीतियों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है।
सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि जब तक मोदी सरकार घरेलू स्तर पर बदनाम रहेगी और अपने देश की एक बड़ी आबादी के साथ दुश्मनों की तरह बर्ताव करती रहेगी, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त समर्थन हासिल नहीं हो सकेगा और सीमाओं के बाहर दुश्मनों के सामने वह मज़बूती से खड़ी नहीं हो सकेगी।
इन सभी चुनौतियों को देखते हुए, लद्दाख़ में चीन के हाथों एक शर्मनाक हार भारतीय राजनीति पर मोदी की पकड़ को ढीला कर देगी। बीजेपी कभी भी धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं बन सकती, लेकिन वह अधिक उदार पार्टी बन सकती है। बीजेपी एक सुधारवादी पार्टी होने का दावा करती है, लेकिन सबसे पहले उसे सबसे कठिन सुधार करना होगा, और वह है ख़ुद की नीतियों में सुधार।