1 सितंबर 2020 - 12:43
इमारात में इस्राईली विमान का उतरना एतिहासिक है लेकिन अपमानजनक एतिहासिक घटना है, दूसरे इंतेफ़ाज़ा आंदोलन ने बहुत से दूतावास बंद करवाए थे, तीसरा इंतेफ़ाज़ा अबू धाबी का दूतावास बंद करवाएगा

अबू धाबी के अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर इस्राईली विमानन कंपनी अलआल के विमान का उतरना और इससे पहले सऊदी सरकार की अनुमति से उसकी वायु सीमा से उसका गुज़रना इसका ढोल पीटने वालों के लिए एतिहासिक घटना तो ज़रूर है लेकिन हर इज़्ज़तदार अरब और मुस्लिम इंसान के लिए यह शर्मनाक वाक़या है।

शैख़ ज़ायद एयरपोर्ट पर ज़ायोनी दुष्ट हस्तियों को लेकर विमान के उतरने की घटना हमारे लिए तो बहुत दर्दनाक थी। हम तो यूरोप में देखते थे कि जब इस्राईली विमान उतरता था तो उसे दूर रोका जाता था और टैंकों से उसकी हिफ़ाज़त की जाती थी क्योंकि यह उस शासन का विमान था जिसने फ़िलिस्तीनियों की धरती हड़प रखी है और जो नस्लपरस्त शासन है।

इससे ज़्यादा दुख हमें यह देखकर हुआ कि विमान पर अलफ़ालूजा गांव का नाम था जिसके निवासियों ने ज़ायोनी चरमपंथियों का डटकर मुक़ाबला किया था और दूसरे शहरों व बस्तियों के लिए आदर्श बने थे। यह गांव मिस्री सेना की सैनिक कमांड का एक केन्द्र था जिसे बाद में घेर लिया गया था और फिर जमाल अब्दुल नासिर और उनके क़रीबी कमांडर वहां से निकले थे और ज़ायोनियों का मुक़ाबला करने के लिए नए सिरे से तैयारियों में लग गए थे।

यह सब कुछ बिनयामिन नेतनयाहू के लिए मुफ़्त का उपहार है और कुशनर को मिलने वाला बड़ा तोहफ़ा है जो अपने गुरू डोनल्ड ट्रम्प को चुनाव में जिताने की निराशापूर्ण कोशिश कर रहे हैं। यह तय है कि इस समझौते के बदले इमारात को शांति नहीं अशांति मिलने वाली है। अगर यक़ीन नहीं आता तो इमारातियों को चाहिए कि जार्डन, मिस्र, बहरैन और तुर्की से पूछ लें।

हो सकता है कि अरब जगत इस समय कमज़ोर हो जिसके शरीर पर अमरीका और इस्राईल ने गहरे घाव लगाए हैं लेकिन यह कमज़ोरी स्थायी नहीं है बल्कि कमज़ोरी का यह दौर यक़ीनन गुज़रेगा।

यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि जब वर्ष 2000 में कैंप डेविड सम्मेलन में फ़िलिस्तीन मुद्दे को मिटा देने की कोशिश शुरु हुई तो उसके बाद इंतेफ़ाज़ा आंदोलन शुरू हो गया था। इसके नतीजे में क़तर मे इस्राईली वाणिज्य दूतावास बंद हुआ, मसक़त में व्यापारिक कार्यालय बंद हुआ, नुवाकशोत में इस्राईली दूतावास बंद हुआ। हमें तो लगता है कि तीसरी इंतेफ़ाज़ा शुरु होगा और अबू धाबी का प्रस्तावित इस्राईली दूतावास बंद होगा। यही नहीं अम्मान और क़ाहेरा में भी इस्राईली दूतावास बंद होंगे।

इस्राईल और इमारात का हनीमून लंबा नहीं चल सकेगा क्योंकि आने वाले दिनों में इमारात को बार बार  निराश होना पड़ेगा। मिस्र जार्डन और मोरीतानिया में इसके बहुत सारे उदाहरण मिलेंगे।

मैंने 18 महीने पहले पत्रकार समुदाय की दावत पर मोरीतानिया की राजधानी का दौरा किया। मैंने इच्छा जताई कि वह इमारत देखना चाहता हूं जहां इस्राईली दूतावास था तो पत्रकार मित्रों ने बताया कि अब वह इमारत बाक़ी नहीं है बल्कि बुल्डोज़र से उसे गिरा दिया गया। अमरीकी दूतावास ने इस्राईली दूतावास गिराए जाने का विरोध किया तो उसका जवाब यह दिया गया कि अमरीकी दूतावास की ओर जाने वाली सड़क का नाम बैतुल मुक़द्दस के नाम पर रख दिया गया और सामने वाले स्क्वायर का नाम अलअक़सा रख दिया गया।

हमें कोई हैरत नहीं है कि इस्लामी दुनिया में अब अरबों की इज़्ज़त जा चुकी है और धार्मिक स्थलों की निगरानी और देखभाल के लिए नया इस्लामी गठजोड़ सामने आ रहा है जिसमें पाकिस्तान, ईरान तुर्की और मलेशिया जैसे देश नेतृत्व संभाल रहे हैं।

जो भी यह समझ रहा है कि इस्राईल से समझौता करने के बदले इमारात को अमरीका से एफ़-35 युद्धक विमान मिल जाएंगे और वह जंगों पर जंगें जीतने लगेगा, वह ग़लतफ़हमी में है। सऊदी अरब, इमारात और क़तर के पास एफ़16 विमानों की बड़ी संख्या है मगर वह तीनों मिलकर एक बड़े गठबंधन की मदद से भी यमन की जंग नहीं जीत सके। वैसे क़तर बाद में इस जंग से अलग हो गया। वर्ष 2006 के लेबनान युद्ध और 2014 के ग़ज़्ज़ा युद्ध में इस्राईल को मीरकावा टैंक विजय नहीं दिला सके बल्कि प्रतिरोधकर्ताओं के मज़बूत इरादों के सामने नाकाम हो गए तो एफ़-35 युद्धक विमान भी समीकरणों को इमारात के हित में बदल नहीं पाएंगे।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार