17 अगस्त 2020 - 13:46
अमेरिका की उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कमला हैरिस कौन हैं? भारतीय-अमेरिकी मूल के नागरिकों में कमला का कितना है प्रभाव?

अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के बहुत से अमेरिकी कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने को एक बड़े बदलाव के तौर पर देखते हैं। भारत का मीडिया भी कमला हैरिस को भारतीय मूल की साबित करने में अपनी पूरी ताक़त लगाए हुए है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वह भारतीय-अमेरिकी समुदाय को डेमोक्रेट्स की बाइडेन-हैरिस जोड़ी के पक्ष में कर पाएंगी?

अमेरिका में वर्ष 2016 के पिछले राष्ट्रपति चुनाव मे भारतीय अमेरिकी समुदाय ज़्यादातर एकजुट नज़र आया। एएपीआई डाटा संस्था के मुताबिक़ इस समुदाय के 85 प्रतिशत लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट दिया। यह संस्था एशियाई अमेरिकियों और प्रशांत क्षेत्रों के द्वीपों पर रहने वाले लोगों की जनसंख्या और उनसे जुड़ी नीतियों पर डाटा प्रकाशित करती है। पिछले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनल्ड ट्रम्प ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे “अबकी बार मोदी सरकार” की तरह "अबकी बार ट्रम्प सरकार" का नारा भी लगाया, लेकिन इससे वह भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक छोटे से हिस्से को ही रिझा पाए। अब 2020 के चुनाव में दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवारों की नज़र भारतीय अमेरिकी समुदाय पर है। अमेरिका की जनसंख्या में इस समुदाय की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से थोड़ी सी ज़्यादा है, लेकिन हाल के वर्षों में इस समुदाय के लोग वोटर और डोनर के तौर पर बहुत सक्रिय हो गए हैं, यही नहीं, यह अमेरिका में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले प्रवासी समूहों में से एक है। अमेरिका में मुस्लिम समुदाय को ध्यान में रखकर दिए गए बयान में डेमोक्रेटिक पार्टी के संभावित उम्मीदवार जो बाइडेन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की है, वह भारत में मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार पर नाराज़गी व्यक्त करते रहे हैं। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने एक ऑनलाइन विज्ञापन अभियान शुरू किया है जिसमें उन्होंने फ़रवरी में अपनी भारत दौरे की तस्वीरें इस्तेमाल की हैं। उन्होंने भारत के साथ मिलकर काम करने और मोदी के साथ दोस्ती बढ़ाने का वादा किया है। पिछले साल ट्रम्प ने मोदी को टेक्सास में आमंत्रित किया था जहां "हाउडी मोदी" के बैनर तले एक राजनीतिक रैली हुई थी, इसमें हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया था।

ट्रम्प द्वारा अपने चुनाव अभियान में इस्तेमाल किए जा रहे भारतीय कार्ड का तोड़ डेमोक्रेटिक पार्टी के पास कमला हैरिस की सूरत में है, जिनकी मां का जन्म चेन्नई में हुआ था, कोलकाता में जन्मीं और तीस साल पहले पीएचडी करने अमेरिका आईं प्रोफेसर संगीता गोपाल कहती हैं, "यह बहुत उत्साहजनक बात है कि कोई अश्वेत महिला पहली बार किसी बड़ी पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में है।" गोपाल लंबे समय से हैरिस के करियर को देख रही हैं, वह कहती हैं, " कमला हैरिस एक प्रभावशाली और ताक़तवर वक्ता हैं" गोपाल, हैरिस की दोस्त हैं। वह हैरिस से इतनी प्रभावित हैं कि अब बाइडेन की चुनावी मुहिम में वोलंटियर के तौर पर काम कर रही हैं। अब यहां पर यह प्रश्न उठता है कि क्या कमला हैरिस को उम्मदीवार बनाए जाने से भारतीय-अमेरिकी समुदाय के उन लोगों को डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ लाया जा सकता है जो ट्रम्प के फैन हैं? इस इसके उत्तर में हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन के संस्थापकों में से एक ऋषि भुटाडा कहते हैं कि उनके फाउंडेशन से लगभग तीन हज़ार लोग जुड़े हैं और ज़्यादातर लोगों का कहना है कि वह ट्रम्प के समर्थक हैं और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए उनके साथ हैं। लेकिन भुटाडा कहते हैं कि जो लोग आम तौर पर वोट डालने नहीं जाते, वे लोग हैरिस की वजह से निकल सकते हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट दे सकते हैं। साथ ही भुटाडा के फाउंडेशन ने अभी तक तय नहीं किया है कि वह किस उम्मीदवार का समर्थन करेगा।कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक ठोस उम्मीदवार के तौर पर देखा जाता है। वह ना तो एकदम नाटकीय बदलाव की समर्थक है और ना ही बहुत ज़्यादा कंजरवेटिव हैं। जमैका और भारत से आए प्रवासी माता-पिता की संतान के तौर पर उनकी पहचान, एक अश्वेत महिला के तौर है। याद रहे कि अब से पहले ऐसे किसी व्यक्ति को अमेरिका के उपराष्ट्रपति जैसे अहम पद के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया गया था। इसलिए हैरिस की उम्मीदवारी भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए एक बड़ा अवसर है। अमेरिका की ओरेगोन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाली भारतीय मूल की अनीता चारी कहती हैं कि यह बहुत ज़रूरी है कि हैरिस जैसी सशक्त महिला नेतृत्व का हिस्सा हो जो अश्वेत और भारतीय मूल की आबादी से जुड़ा हो। वह कहती हैं कि, "उनकी उम्मीदवारी के बारे में सबसे अच्छी बात मुझे यह लगती है कि भारतीय अमेरिकी, दक्षिण एशियाई लोग उनके साथ एकजुटता दिखा सकते हैं। साथ ही भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदाय में नस्लवाद से निपटने के बारे में भी बात हो सकती है।" प्रोफेसर अनीता चारी का कहना है कि, "लंबे समय तक अमेरिकी समाज में भारतीय-अमेरिकी संस्कृति कहीं दिखती ही नहीं थी, लेकिन बीते पांच साल में बहुत कुछ बदला है" वह कहती हैं कि ट्रम्प प्रशासन ने प्रवासी लोगों के प्रति जिस तरह की आक्रामकता दिखाई है, उससे निपटने में हैरिस की प्रवासी पृष्ठभूमि मदद करेगी। कुल मिलाकर जैसे-जैसे अमेरिका में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं वैसे-वैसे ऐसा लग रहा है कि मोदी का “हाउडी मोदी” और ट्रम्प का “नमस्ते ट्रम्प” अमेरिका के आगामी राष्ट्रपति चुनाव में कमला हैरिस और जो बाइडेन की जोड़ी के आगे भारतीय-अमेरिकी समुदाय पर अपना कोई प्रभाव नहीं डाल पाएगा।