हालिया हफ़्तों में गलवान घाटी की घटना हुई और चीन और भारत की सेनाएं आमने सामने आ गईं। फिर बड़ी मेहनतों और सैनिक व कूटनैतिक स्तर पर लंबी वार्ताओं के बाद किसी तरह तनाव को कम किया गया। भारतीय मीडिया का उतावला तबक़ा तो जीत मिल जाने और चीन को होश में लाने जैसी बातें भी करने लगा मगर अब जब ज़मीनी हालात की तसवीर सामने आ रही है तो वही मीडिया अब कहने पर मजबूर है कि चीन ने अपने सैनिक पीछे नहीं हटाए हैं।
गलवान घाटी की जो स्थिति है विशलेषक उसे भारत की कमज़ोरी का उदाहरण मान रहे हैं क्योंकि भारत सरकार यह दावा तक नहीं कर पा रही है कि उसके इलाक़ों में चीनी सैनिक घुसे हैं क्योंकि इस प्रकार का बयान देने की स्थिति में वह आंतरिक रूप से घिर जाएगी और विपक्ष उस पर हमले तेज़ कर देगा जो पहले ही अपने हमले शुरू कर चुका है। मोदी सरकार पर दबाव बनेगा कि वह कार्यवाही करके चीनी सैनिकों को कथित रूप से भारत के इलाक़ों से बाहर निकाले। क्योंकि ख़ुद मोदी बीते समय में चीन के मामलें में केंन्द्र सरकार को घेरने और ललकारने में बहुत मुखर रहते थे।
इस समय बात यहां तक पहुंच गई है कि गलवान घाटी के हालात के बाद के समय को टीकाकार एक नया अध्याय कह रहे हैं जिसमें भारत इलाक़ाई स्तर पर कमज़ोर पड़ चुका है और उसकी साख ध्वस्त हो चुकी है।
पाकिस्तान के डान अख़बार में छपे लेख में टीकाकार का कहना है कि गलवान की घटना के बाद अब इलाक़े ही नहीं दुनिया में भी भारत का प्रभाव कम हो जाएगा। गलवान में भारत को अपमानित होना पड़ा है और इस हालत से मुक्ति पाने के लिए भारत अमरीका की गोद में जा बैठने पर मजबूर हो सकता है जो भारत की मज़बूत शक्ति की छवि को ध्वस्त कर देगा।
इससे पहले पुलवामा हमला और इस हमले के बाद बालाकोट की घटना और भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई टकराव जो हुआ उसके बाद दोनों ओर से बहुत सारे दावे किए गए और दोनों ही देशों ने दूसरे को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचाने की बात कही मगर ज़मीन पर जो चीज़ नज़र आई वह यह थी कि भारत का कम से कम एक युद्धक विमान पाकिस्तान ने मार गिराया और विंग कमांडर अभिनन्दन को पकड़ लिया जिसे दो दिन बाद छोड़ भी दिया गया। इससे यह संदेश ज़रूर गया कि भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान को चाहे जितना कमज़ोर समझे लेकिन मुक़ाबला हो जाने की स्थिति में वह बढ़त नहीं बना पाया, यानी हालात पहले की तुलना में अब काफ़ी बदल चुके हैं।
देश के भीतर बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर राम मंदिर बनाने के मुद्दे और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के मुद्दे से लेकर राज्यों में अन्य दलों की सरकारें गिराने और मुसलमानों में भय फैलाने जैसे अनेक मोर्चों पर मोदी सरकार कामयाब रही है लेकिन क्षेत्र और विश्व स्तर पर यह सरकार परसेप्शन की जंग हारती जा रही है।
अहमद अब्बास
नोटः लेखक की राय से पार्स टुडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।