28 जून 2020 - 13:09
आयत क्या कहती हैं? संसार को सदैव युक्ति की आवश्यकता है और सृष्टि के संचालन की युक्ति का एक होना, ईश्वर के अनन्य होने का प्रमाण है।

जब तुम ईश्वर को मानते हो और यह बात स्वीकार करते हो कि तुम्हारी रोज़ी उसके हाथ में है तथा तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसी पर निर्भर है तो फिर क्यों उसके स्थान पर मूर्तियों की पूजा करते हो और उससे नहीं डरते?

सूरए यूनुस की आयत क्रमांक 31 का अनुवादः

(हे पैग़म्बर अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि कौन तुम्हें आकाशों और धरती से रोज़ी अर्थात आजीविका देता है? या कान और आंख पर किसका अधिकार है? और कौन है जो जीवित को निर्जीव से और निर्जीव को जीवित से निकालता है? और कौन यह सारी व्यवस्था चल रहा है? तो वे शीघ्र ही कहेंगे कि ईश्वर! तो कह दीजिए कि फिर तुम ईश्वर से क्यों नहीं डरते?

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

प्रश्न उत्पन्न करना, उत्तर के लिए चिंतन करना और पवित्र ईश्वरीय प्रवृत्ति से संपर्क करना लोगों के संबंध में पैग़म्बरों की शैली रही है।

 

इस आयत से मिलने वाले पाठ:

  1. कि प्रश्न उत्पन्न करना, उत्तर के लिए चिंतन करना और पवित्र ईश्वरीय प्रवृत्ति से संपर्क करना लोगों के संबंध में पैग़म्बरों की शैली रही है।

  2. संसार को सदैव युक्ति की आवश्यकता है और सृष्टि के संचालन की युक्ति का एक होना, ईश्वर के अनन्य होने का प्रमाण है।​​​​​​​