27 जून 2020 - 17:06
भारत-चीन के बीच तनातनी के दौरान, राजनाथ सिंह बड़ी उम्मीदें लेकर मास्को रवाना हुए थे, क्या रूस ने भारत को निराश कर दिया?

पिछले हफ़्ते मास्को रवाना होने से पहले भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट करके कहा थाः तीन दिवसीय यात्रा पर मास्को रवाना हो रहा हूं। इस यात्रा से भारत-रूस रक्षा और सामरिक साझेदारी को मज़बूत करने का अवसर मिलेगा।

यहां यह सवाल है कि क्या मास्को ने उन्हें यह अवसर प्रदान किया या वह ख़ाली हाथ ही घर वापस लौट गए?

रूस, भारत का एक पारम्परिक और ऐतिहासिक भागीदार रहा है, जिसका भारत के रक्षा क्षेत्र में किसी भी देश से अधिक योगदान रहा है।

हालांकि अंतरराष्ट्रीय कूटननीति में कोई स्थायी दोस्त या स्थायी दुश्मन नहीं होता है, केवल हित स्थायी होते हैं।

लेकिन राष्ट्रीय हितों की सही पहचान और उसके आधार पर दोस्त और दुश्मन की सही शनाख़्त का महत्व, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस सिद्धांत से किसी भी तरह से कम नहीं है।    

2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालते ही भारत सरकार ने देश के पुराने और नए दोस्तों की लिस्ट पर एक नज़र डाली और कुछ नए दोस्तों को प्राथमिकता दी। निश्चित रूप से मोदी सरकार की इस विदेश नीति का आधार भी राष्ट्रीय हित ही रहे होंगे और उसने अपने नए व पुराने दोस्तों के बीच संतुलन स्थापित करने का भी प्रयास किया होगा।

लेकिन उससे ऐसी चूक कहां हुई कि रूस जैसे रणनीतिक साझेदार भी कहीं पीछे छूट गए।

वास्तव में प्रधान मंत्री मोदी का वैचारिक बैकग्राउंड जहां उनकी सबसे बड़ी ताक़त है, तो वहीं उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। कट्टर राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी विचारधारा की लहर ने उन्हें सत्ता सौंपी, लेकिन यही विचारधारा, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक राष्ट्रीय हितों की पहचान के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट है।

दूसरे यह कि भारत के कट्टर राष्ट्रवादियों को पाकिस्तान नामक भूत कभी सोचने समझने का मौक़ा ही नहीं देता है। इसलिए वह उससे हार या जीत से आगे बढ़कर कुछ सोच ही नहीं सके। हालांकि बग़ल में चीन जैसा शक्तिशाली और बड़ा देश, समय समय पर अपने पड़ोसी देश को जगाने के लिए झटके देता रहा, लेकिन उसके नेताओं के दिमाग़ से पाकिस्तान का ख़ुमार कभी नहीं उतरा।

घरेलू स्तर पर मोदी और उससे पहले कांग्रेस की सरकारें, फ़र्ज़ी आतंकवाद, मुसलमानों की लिंचिंग, दलितों और अल्पसंख्यकों को मूल सुख-सुविधाओं से वंचित रखने जैसी नीतियों से ख़ुद को आज़ाद नहीं करा सकीं और सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में डूबी रहीं।

दूसरी ओर चीन बड़ी ख़ामोशी से विकास करता रहा और उसने देश में विज्ञान और तकनीक का मज़बूत ताना-बाना बुन दिया। आज चीन, अमरीका हो या रूस विश्व के क़रीब हर बड़े देश का एक मुख्य साझेदार है और वह सबकी ज़रूरत बनता जा रहा है।  

उदाहरण के तौर पर चीन और रूस के बीच पारस्परिक सालाना व्यापार 110 अरब डॉलर से भी अधिक है, तो वहीं भारत और रूस के बीच पारस्परिक सालाना व्यापार केवल 7 अरब डॉलर है। वहीं चीन और रूस के बीच सालाना व्यापार 559 अरब डॉलर है तो भारत और अमरीका के बीच सालाना व्यापार केवल 87.9 अरब डॉलर है।

भारत और चीन के बीच पिछले साल द्विपक्षी व्यापार क़रीब 85 अरब डॉलर का हुआ, जिसमें भारत ने चीन को क़रीब 16 अरब डॉलर का निर्यात किया, लेकिन चीन से लगभग 52 अरब डॉलर का आयात किया। आयात और निर्यात के बीच इतने बड़े अंतर से ख़ुद भारत की चीन पर निर्भरता साफ़ दिखाई देती है।

अब जहां तक मास्को की बात है, वह चीन के साथ 110 अरब डॉलर के मुक़बाले भारत से 7 अरब डॉलर के लिए बीजिंग को नाराज़ नहीं करना चाहेगा। वह भी एक ऐसी सरकार के लिए जो पुराने संबंधों और समझौतों को नज़र अंदाज़ करके नए दोस्तों की खोज में इधर-उधर भटक रही हो।

हालांकि लद्दाख एलएसी पर चीन के साथ जारी तनाव के दौरान भारत को एक बार फिर रूस की शिद्दत से याद आई और भारतीय रक्षा मंत्री अपने हथियारों को अधिक धारदार बनाने और उनकी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए मास्को रवाना हुए, लेकिन उन्हें वहां से लगभग निराश होकर वापस लौटना पड़ा।

क्योंकि भारत सरकार काफ़ी देर से जागी और अंतरराष्ट्रीय नीति के स्तर पर भी चीन, भारत से बाज़ी ले गया। यहां तक कि रूसी अधिकारियों ने एलान कर दिया कि मास्को भारत-चीन टकराव में पूरी तरह से निष्पक्ष रहेगा, हां दोनों पक्षों के आग्रह पर एक प्रभावशाली मध्यस्थ की भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटेगा।