27 मई 2020 - 15:13
गद्दारी का इतिहास पढ़ें! कैसे सऊदी अरब और अरब सरकारों ने फिलिस्तीन की पीठ में छुरा घोंपा?

यूं अगर देखें तो सऊदी अरब और इस्राईल मे कोई समान बिन्दु नज़र नहीं आएगा। न भौगोलिक दृष्टि से उनमें कोई समानता है न राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से! यहां तक कि पूरे इतिहास में भी कोई एसा बिन्दु नहीं हैं जहां दोनों में कोई समानता मिल सके। लेकिन गत पचास वर्षों के दौरान उनके इतिहास पर नज़र डालने के यह पता चलता है कि सऊदी अरब और इस्राईल ने विदित रूप से इतनी असमानता के बावजूद कई बार एक दूसरे के साथ निकट सहयोग किया है और एक दूसरे की भरपूर मदद की है अलबत्ता यह सहयोग हमेशा गुप्त रहा है। इसके कुछ उदाहरण इतिहा

यमन पर सैन्य हमला!

सन 2015 में यमन पर सऊदी अरब के हमले से 60 के दशक में यमन पर एक अन्य हमले की याद आती है। यह वह समय था जब मिस्र में जमाल अब्दुन्नासिर की सरकार ने यमन अरब गणराज्य की सरकार को बचाने के लिए यमन पर चढ़ाई कर दी थी।

     यमन में मिस्री सैनिकों की उपस्थिति और यमन के अरब सोश्लिस्टों की मदद की वजह से सऊदी अरब को भी यमन में शाही सैनिकों की मदद के लिए मैदान में उतरना पड़ा। हालांकि सऊदी अरब के पास काफी दौलत थी लेकिन इस प्रकार के अभियान के लिए जिस तरह के खुफिया एजेन्टों और सैन्य साधनों की ज़रूरत होती है, उसका सऊदी अरब में कहीं पता नहीं था इसी लिए इस्राईली की खुफिया एजेन्सी मोसाद आगे आयी और उसने यमन में  मिस्री सैनिकों के खिलाफ अभियान में सऊदी अरब के साथ भरपूर सहयोग  किया इस तरह से इस्राईल ने सऊदी अरब को प्रसन्न कर दिया।

     रोचक तथ्य यह है कि इस सहयोग में ईरान की  शाही सरकार की खुफिया एजेन्सी, सावाक ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैसे इस सहयोग में ब्रिटेन की भी भूमिका थी। ब्रिटेन को यह भय था कि कहीं यमन जमाल अब्दुन्नासिर का घटक न बन जाए इसी लिए ब्रिटेन, यमन में मिस्र की सेना के खिलाफ युद्ध के लिए आवश्यक हथियार देता था। हालांकि यमन पर मिस्री सैनिकों का कब्ज़ा हो गया था लेकिन यमन जमाल अब्दुन्नासिर के लिए वियतनाम बन गया जिसका मिस्र को काफी नुकसान उठाना पड़ा।

 

हथियारों के दलाल आए मैदान में

सऊदी अरब और इस्राईल के बीच सहयोग जारी रहा। ईरान में क्रांति आयी और तानाशही व्यवस्था खत्म हो गयी। सऊदी अरब को नया खतरा महसूस होने लगा। इसी के सथ सन 1979 में कुछ सलफी छात्रों ने विद्रोह किया और काबे पर क़ब्ज़ा कर लिया जिससे सऊदी अरब को यह पता चल गया कि सब कुछ उसके लिए ठीक नहीं है और वह कितना कमज़ोर है? 

     सऊदी अरब ने इस तरह के खतरे से मुकाबला करने के लिए जम कर हथियार खरीदना शुरु कर दिया लेकिन इससे इस्राईल को तकलीफ होने लगी और अमरीकी कांग्रेस में इस प्रकार के समझौतों को खत्म करने के लिए लाबिंग शुरु हो गयी। सऊदी अरब और इस्राईल दोनों अमरीका के निकटवर्ती घटक इस लिए इस समस्या के समाधान की ज़िम्मेदारी, सऊदी अरब के विश्व विख्यात हथियार दलाल अदनान खाशुकजी को सौपी गयी। अदनान खाशुकजी ने कई बार कहा कि वह सऊदी नरेश फहद के प्रतिनिधि हैं और इस्राईली अधिकारियों से उनके निकट संबंध हैं।

     खाशुकजी की मेहनत रंग लायी और सऊदी अरब व इस्राईल के बीच मन मुटाव दूर हो गया। उन्होंने सऊदी अरब और इस्राईल के बीच संबंध स्थापना की भी कोशिश की।

     उन्होंने सऊदी अरब के नरेश को यह यकीन दिला दिया कि अगर बैतुलमुकद्दस पर इस्राईल का क़ब्ज़ा हो जाए तो इससे अरब देशों को कोई खास समस्या नहीं होगी और लगभग 300 अरब डालर के बजट में दोनों पक्षों के बीच संधि हो जाएगी।

     यह योजना तो आगे नहीं बढ़ लेकिन ज़मीन के बदले धन फिलिस्तीनियों का भाग बन गया।

 

इराक़ से लेबनान तक फैला सहयोग

21 वीं सदी हंगामों से भरी रही जिसकी वजह से सऊदी अरब के लिए नये नये खतरे पैदा हुए और सऊदी अरब को यह लगने लगा कि इन खतरों की अस्ल वजह इलाक़े में ईरान का बढ़ता प्रभाव है। इस के लिए उसने इस्राईल की मदद अधिक लेना उचित समझा और उसकी तरफ बढ़ता चला गया क्योंकि इससे पहले इराक़ और लेबनान में वह अपने तौर पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर चुका था मगर नाकामी के बाद उसकी समझ में आया कि ईरान को रोकने के लिए उसे एक ताकतवर सहयोगी ज़रुरत है इस लिए उसने इस्राईल की तरफ हाथ बढ़ाया। लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ इस्राईल का हमला इस प्रकार के सहयोग का आरंभ था अगर इस्राईल कामयाब हो जाता तो यह सऊदी अरब के लिए बहुत बड़ी सफलता थी मगर हिज़्बुल्लाह ने उसे धूल चटा दी।  33 दिनों तक चलने वाले इस हमले में सऊदी अरब ने इस्राईल का भरपूर साथ दिया था। इस खुफिया सहयोग से सन 2007 में पर्दा उठ गया था।

     सऊदी अरब ने यमन पर जो हमला किया उसमें भी उसे अमरीका और इस्राईल का पूरा साथ था । सन 2015 में पता चला कि सन 2014 से 2015 के बीच इस्राईली और सऊदी अधिकारियों ने कम से कम 5 बार खुफिया भेंट की । यह भेंट, भारत, इटली, और चेक गणराज्य में हुई थीं।

 

     इस्राईल से  सऊदी अरब की आशाएं!

      दर अस्ल सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को बड़ी उम्मीद है कि वह इस्राईल से विशेष प्रकार के संबंधों के बल पर सऊदी अरब के सिंहासन पर अपनी पकड़ मज़बूत कर लेंगे। इसके लिए उन्होंने 500 अरब डालर की लागत का एक शहर बनाने की योजना तैयार की जहां से इस्राईल और अन्य अरब देशों के बीच व्यापार बहुत सुविधाजनक हो जाएगा। इस साल रमज़ान के महीने में भी सऊदी टीवी चैनलों ने मुसलमानों के लिए विशेष प्रकार के सीरियल तैयार किये जिनमें अरबों और इस्राईल के बीच संबंधों को सामान्य दर्शाया गया है।

     हालांकि सऊदी अरब की गद्दारी का मुसलमानों को भारी मूल्य चुकाना पड़ रहा है लेकिन यह सच्चाई है कि फिलिस्तीनी मुद्दे को भुलाने की हर कोशिश नाकाम होगी और यह अनुमान नहीं बल्कि इस्राईल के अस्तित्व में आने के बाद से प्राप्त होने वाला अनुभव है। Q.A. साभार, फार्स न्यूज़ एजेन्सी