इसलिए कि फ़ैसला बदलने का इरादा यह साबित करता है कि वह शंका में पड़े हुए हैं और कोरोना वायरस की महामारी से अमरीका के भीतर और विश्व स्तर पर जो हालात बने हैं उनको संभाल नहीं पा रहे हैं। इससे यह भी साबित होता है कि अमरीका जैसे देश का संचालन ट्रम्प के बस की बात नहीं है।
सारी दुनिया को ट्रम्प के इस फ़ैसले पर बड़ी हैरानी हुई थी कि वह डब्ल्यूएचओ की फ़ंडिंग इसलिए रोक रहे हैं कि यह संस्था अपना काम ठीक से अंजाम नहीं दे रही है और उसने चीन के साथ सांठगांठ करके कोविड-19 के बारे में बहुत महत्वपूर्ण जानकारियों को छिपाया है। ट्रम्प प्रशासन की ओर से जितने भी तर्क दिए गए हैं सब ग़ैर संतोषजनक हैं। ट्रम्प के इस फ़ैसले की वजह शायद उनकी नस्लवादी सोच ही रही हो कि जिस संस्था का नेतृत्व इथोपियाई मूल का व्यक्ति संभाल रहा है उसकी फ़ंडिंग करना अमरीका के लिए उचित नहीं है।
ट्रम्प ने शनिवार को ट्वीट किया कि अमरीका डब्ल्यूएचओ को अब तक दिए जाने वाले फंड का केवल दस प्रतिशत देगा जो चीन से डब्ल्यूएचओ को मिलने वाली फ़ंडिंग के बराबर होगा। इस तरह ट्रम्प ने यह स्वीकार भी कर लिया है कि चीन सुपर पावर बन चुका है और अमरीका के बराबर आ खड़ा हुआ है। ट्रम्प के इस फ़ैसले से दूसरी सच्चाई यह साबित हुई है कि ट्रम्प डब्ल्यूएचओ पर जो आरोप लगा रहे थे वे बेबुनियाद थे। इसीलिए उन्हें बड़े अपमानजनक रूप से अपने फ़ैसले से पीछे हटना पड़ा।
सच्चाई तो यह है कि यह व्यक्ति अब मज़ाक़ बनकर रख गया है साथ ही वह केवल अमरीका ही नहीं बल्कि विश्व समुदाय के लिए राजनैतिक, नैतिक और लीडरशिप के स्तर पर एक बोझ बनकर रह गया है। उनका रवैया किसी स्टेटमैन का हरगिज़ नहीं है।
इस व्यक्ति को सत्ता से हटाना अमरीकी जनता की ज़िम्मेदारी है और यह काम जितनी जल्दी संभव है हो जाना चाहिए ताकि ट्रम्प को यह मौक़ा न मिले कि वह पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध में ढकेल दें।
स्रोतः रायुल यौम