उपासनाओं में सबसे नमाज़ है और नमाज़ को जो चीज़ें नुकसान पहुंचाती हैं उनमें से कुछ का वर्णन पवित्र क़ुरआन में हुआ है। महान ईश्वर कुरआने मजीद के सूरए माऊन में कहता हैः “क्या उस व्यक्ति को देखा है जो प्रलय के दिन को हमेशा झूठ समझता था? वह वही है जो अनाथ को झिड़कता था और दूसरों को वंचितों और ज़रूरतमंदों को खाना देने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता था। धिक्कार हो ऐसे नमाज़ियों पर जो अपनी नमाज़ों से निश्चेत हैं। वे हमेशा दिखावा करते हैं। वे हमेशा लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने से कतराते और उसमें रुकावट बनते हैं।
पवित्र क़ुरआन की आयतों के अनुसार वंचितों, भूखों और ज़रूरतमंदों की उपेक्षा वह चीज़ है जो नमाज़ को नुक़सान पहुंचाती है। रोचक बिन्दु यह है कि जो इंसान नमाज़ पढ़ता है परंतु भूखों और ज़रूरतमंदों का ख़याल नहीं रखता तो वह वास्तव में प्रलय के दिन पर ईमान नहीं रखता और अगर ईमान रखता होता तो ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को ध्यान में रखता और अनाथों को कभी नहीं झिड़कता। महान ईश्वर ने ऐसे नमाज़ी की न केवल सराहना नहीं की है बल्कि निंदा की है और कहा है कि ऐसे नमाज़ियों पर धिक्कार हो।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इस प्रकार के नमाज़ियों की वास्तविकता बयान करते हुए फ़रमाते हैं। "कुछ लोगों के नमाज़-रोज़े से धोखा न खाना क्योंकि इस प्रकार के लोगों के लिए नमाज़ एक आदत हो गयी है और वे इसे छोड़ना चाहें तो उनके लिए कठिन होगा। उनकी पहचान के लिए यह देखना होगा कि वे कितना सत्य बोलते और अमानत का कितना ध्यान रखते हैं।
जिन नमाज़ियों में इस प्रकार के अवगुण पाये जाते हैं वे आमतौर पर नमाज़ को महत्व नहीं देते हैं और उसे हल्का समझते हैं। इस प्रकार के नमाज़ियों की पवित्र कुरआन और रिवायतों में निंदा की गयी है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्रइमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैंः "अपनी नमाज़ को हल्का न समझो क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवने के अंतिम क्षण में कहा था कि वह मुझसे नहीं है जो नमाज़ को हल्का समझेगा।
पैग़म्बरे इस्लाम का यह कथन ध्यान योग्य है जिसमें आप फ़रमाते हैं कि नमाज़ को हल्का समझने वाला हमसे नहीं है। नमाज़ एक ईश्वरीय दायित्व है और वह महान ईश्वर और इंसान के मध्य संपर्क का महत्वपूर्ण साधन है। रिवायत में है कि जब इमाम जाफ़र सादिक़ के जीवन का अंतिम समय था तो उन्होंने अपने परिजनों को इकट्ठा किया और कहा कि प्रलय के दिन उस व्यक्ति को हमारी शिफ़ाअत नहीं मिलेगी जो नमाज़ को हल्का समझेगा।
इस आधार पर जिन चीज़ों से नमाज़ को आघात पहुंचता है उनमें से एक नमाज़ को हल्का समझना है। यहां यह सवाल पैदा हो सकता है कि कुछ लोग नमाज़ पढ़ने का दिखावा करते हैं, सच बोलने और अमानतदारी जैसे नैतिक मूल्यों के प्रति कोई विशेष कटिबद्ध नहीं रहते तो इस प्रकार की दिखावटी नमाज़ और उपासना से उनका क्या लक्ष्य है? ईश्वर इस सवाल का जवाब देते हुए पवित्र क़ुरआन के सूरए निसा की 142वीं आयत में कहता हैः "मिथ्याचारी ईश्वर को धोखा देना चाहते हैं जबकि वह उन्हें धोखा देता है और जब वे नमाज़ के लिए उठते हैं तो सुस्ती के साथ उठते हैं और वे लोगों के सामने दिखावा करते हैं और ईश्वर को थोड़ा सा ही याद करते हैं।"
नमाज़ की एक रचनात्मक विशेषता यह है कि वह नमाज़ी को पापों से दूर करती है और एक प्रकार से उसे सुरक्षित कर लेती है। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए अन्कबूत की 45वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को आदेश देता हैः "हे पैग़म्बर! आप पर जो उतारा गया है उसकी तिलावत कीजिये और नमाज़ पढ़िये कि नमाज़ बुराइयों और पापों से रोकती है। ईश्वर की याद महान है और जो कुछ आप करते हैं उसे ईश्वर जानता है।"
यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि शैतान इंसान की सृष्टि के आरंभ से उसका खुला हुआ दुश्मन है और ईश्वर ने पवित्र कुरआन में बारंबार कहा है कि शैतान इंसान का खुला दुश्मन है। महान ईश्वर ने जब फरिश्तों को हज़रत आदम का सज्दा करने का आदेश दिया था तो शैतान के अलावा सबने हज़रत आदम के सामने सज्दा किया था। महान ईश्वर ने शैतान से पूछा कि तूने सज्दा क्यों नहीं किया? तो शैतान ने महान ईश्वर से कहा तूने आदम को मिट्टी से पैदा किया और मुझे आग से पैदा किया है इस लिए मैं आदम से श्रेष्ठ हूं। तो ईश्वर ने उसे अपनी बारगाह से निकलने का आदेश दिया। इस पर शैतान ने उससे कहा था कि मैं तेरे विशेष बंदों के अलावा सबको बहकाऊंगा। सारांश यह कि शैतान ने इंसानों को बहकाने की क़सम खा रखी है यानी वह समस्त इंसानों का खुला दुश्मन है परंतु नमाज़ एक ऐसी चीज़ है जो इंसान को महान ईश्वर से निकट करती है।
पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैंः "नमाज़ शैतान के चेहरे को काला कर देती है। एक अन्य स्थान पर वे पापों से होने वाले नुक़सान के बारे में कहते हैंः "जिसकी नमाज़ उसे पापों से न रोक सके तो वह ईश्वरीय बारगाह से दूर हो जायेगा।" नमाज़ को जिन चीज़ों से आघात पहुंच सकता है उनमें ख़ुम्स और ज़कात का न देना भी है। उसकी एक वजह यह है कि ख़ुम्स और ज़कात वास्तव में दूसरों का हक़ है जिसे नमाज़ी को दे देना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैंः "ईश्वर ने मुझे संदेश भेजा है कि लोगों से कह दूं कि जब तक मेरे यानी ईश्वर के किसी एक बंदे के अधिकार किसी की गर्दन पर होंगे तब तक वह मेरे किसी भी घर में दाख़िल नहीं होगा क्योंकि जब तक वह नमाज़ पढ़ेगा उसे मैं अपनी दया से दूर रखूंगा किन्तु यह कि जिसका अधिकार उसके ज़िम्मे है उसे दे दे।" महान ईश्वर से दुआ है कि हम सबको वास्तविक नमाज़ियों में क़रार दे।
दोस्तो! अब हम आपको यह बतायेंगे कि इस्लाम में नमाज़े जमाअत अर्थात सामूहिक रूप से पढ़ी जाने वाली नमाज़ पर जो बल दिया गया है उसके पीछे क्या रहस्य व लाभ हैं? सामूहिक रूप से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों का एक लाभ यह है कि उससे सामाजिक संबंध मज़बूत होते हैं। सामाजिक संबंधों को मज़बूत करने के लिए इस्लाम ने विभिन्न शैलियों व मार्गों को अपनाया है जिनमें से एक मस्जिदों में सामूहिक रूप से पढ़ी जाने वाली नमाज़ें हैं। सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ने वालों में एक दूसरे के प्रति प्रेम व स्नेह उत्पन्न होता है। इसी प्रकार सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ने वाले बहुत से मामलों में एक दूसरे से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ने के लिए इस्लाम ने मुसलमानों को प्रोत्साहित किया है। पैग़म्बरे इस्लाम मुसलमानों को एकजुट करने के लिए नमाज़े जमाअत का आदेश देते और कहते हैंः "जान लो कि जो भी सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद की ओर क़दम बढ़ाता है तो ईश्वर फरिश्तों को आदेश देता है कि उसके हर क़दम के बदले में 70 हज़ार पुण्य उसके कर्मपत्र में लिखे दिये जायें और 70 हज़ार पाप उसके कर्मपत्र से मिटा दिये जायें और इतने ही उसके दर्जे ऊंचे कर दिये जायें।" इसी प्रकार महान ईश्वर 70 हज़ार फ़रिश्तों को आदेश देता है कि वे क़ब्र में उसकी ज़ियारत करने के लिए जायें और प्रलय के दिन तक उसके लिए क्षमा याचना करते रहें।"
यद्यपि यह हदीस जहां नमाज़े जमाअत का महत्व बयान करती है वहीं इसमें एक प्रकार की सीमितता है क्योंकि इसमें 70 हज़ार का वर्णन है परंतु एक अन्य रिवायत है जो इस बात की सूचक है कि नमाज़े जमाअत का सवाब सीमित नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैंः "ज़ोह्र अर्थात दोपहर की नमाज़ के बाद जिब्रईल 70 हज़ार फ़रिश्तों के साथ मेरे घर नाज़िल हुए और मुझसे कहा हे मोहम्मद! महान ईश्वर ने आपको सलाम कहा है, उसके बाद कहा है कि मैंने आपको दो उपहार दिये हैं जो आपसे पहले वाले पैग़म्बरों को नहीं दिए हैं।" पैग़म्बरे इस्लाम ने पूछा वे दो उपहार क्या हैं? तो हज़रत जिब्रईल ने जवाब दियाः "एक दिन में पांच बार पढ़ी जाने वाली नमाज़ और दूसरे नमाज़े जमाअत।" उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत जिब्रईल से पूछा नमाज़े जमाअत का क्या सवाब है? इसके जवाब में हज़रत जिब्रईल ने कहा हे मोहम्मद! अगर नमाज़े जमाअत में इमाम के अलावा एक व्यक्ति उपस्थित रहे तो उन्हें 150 नमाज़ों का सवाब दिया जायेगा, अगर नमाज़े जमाअत में दो व्यक्ति रहें तो 600 नमाज़ों का सवाब दिया जायेगा और इसी तरह जितनी उनकी संख्या बढ़ती रहेगी उसका सवाब भी उतना बढ़ता रहेगा। जब नमाज़ जमाअत पढ़ने वालों की संख्या 10 से अधिक हो जायेगी तो अगर समस्त समुद्र सियाही बन जायें और सारे पेड़ क़लम बन जायें और सभी इंसान, जिन्नात और फ़रिश्ते लिखने वाले बन जायें तब भी एक रकत नमाज़े जमाअत का सवाब नहीं लिख सकते।
इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैंः "प्रलय के दिन लोगों के एक गुट को उठाया जायेगा जिनके चेहरे तारों की तरह चमक रहे होंगे। फ़रिश्ते उनसे पूछेंगे कि आप लोग दुनिया में क्या करते थे कि आप लोगों के चेहरे इस प्रकार चमक रहे हैं? जवाब में वे लोग कहेंगे, जब हम मस्जिद से अज़ान सुनते थे तो तुरंत मस्जिद में नमाज़े जमाअत पढ़ने के लिए चल देते थे। उसके बाद प्रलय के मैदान में दूसरे दल को लाया जायेगा और उनके चेहरे चांद की तरह चमकते होंगे उनसे भी फ़रिश्ते यही सवाल करेंगे तो जवाब में वे लोग कहेंगे कि नमाज़ का वक्त होने से पहले ही हम नमाज़े जमाअत में जाने की तैयारी करने लगते थे और नमाज़े जमाअत के लिए मस्जिद में जाते थे। उसके बाद प्रलय के मैदान में लोगों के तीसरे गिरोह को लाया जायेगा और उस गिरोह के लोगों का चेहरा सूरज की भांति चमक रहा होगा। फ़रिश्ते उनसे भी वही सवाल करेंगे तो वे जवाब में कहेंगे कि हम नमाज़े जमाअत शुरू होने से पहले ही मस्जिद में हाज़िर हो जाते थे।