हालांकि अभी यह संकट अमरीकी तेल को अपनी लपेट में लिये है और ब्रंट तेल अब भी 20 डालर में बिक रहा है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत जल्द ही तेल उत्पादन करने वाले देशों की भंडारण क्षमता खत्म हो जाएगी तब अस्ल संकट शुरु होगा। इस वक्त भी चीन की भंडारण क्षमता एक अरब बैरल तक भर चुकी है और अब उसके पास केवल पचास करोड़ बैरल तेल रखने की ही क्षमता है जो अगले दो महीने में भर जाएगी।
चीन की भडांरण क्षमता जब खत्म होगी तो इसका सीधा असर मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों अर्थात, सऊदी अरब , कुवैत और यूएई पर पड़ेगा लेकिन चूंकि चीन प्रतिदिन बीस लाख बैरल कच्चा तेल चीन को निर्यात करता है इस लिए सब से अधिक उस पर असर पड़ेगा। सऊदी अरब और रूस , इस स्थिति का ज़िम्मेदार अमरीका को बताते हैं।
अमरीका ने एक हज़ार अरब डालर का पुंजीनिवेश करके खुद को तेल नियार्तक देश बना लिया है जिसकी वजह से अमरीका और सऊदी अरब के बीच 65 वर्ष पहले किया गया वह एतिहासिक समझौता खत्म हो गया जिसमें सऊदी अरब के तेल के बदले उसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अमरीका ने ली थी।
सऊदी अरब ने यह कोशिश की थी कि बाज़ार में तेल की बाढ़ लाकर अमरीका के शेल आयल कंपनी का राज खत्म कर दें मगर इससे अमरीका नाराज़ हो गया फिर सऊदी अरब को यह भी पता चल गया कि इस बार वह इस लड़ाई में काफी कमज़ोर हैं।
फार्स की खाड़ी के सभी देशों में सब से अधिक कमज़ोर सऊदी अरब है। विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब भी, कुवैत, यूएई और क़तर की तरह एक शानदार होटल की तरह है। इन देशों के नागरिक पैदा होते ही होटल में रहने लगते हैं और उन सेवाओं को मांग करते हैं जो उन्हें उनकी सरकार तेल बेच कर देती है।
सऊदी अरब में हर तीन कर्मचारी में से दो विदेशी हैं, इस देश के नागरिकों में काम करने की दिलचस्पी बहुत कम है। जब सऊदी अरब से अचानक ही विदेशी कर्मचारी निकाले जाने लगे तब वहां की कंपनियों को पता चला कि सऊदी अरब के नागरिक के लिए बहुत से ऐसे काम हैं जो उन्होंने कभी किये ही नहीं है।
आज भी सऊदी अरब का बजट इस देश की तेल कंपनी आरामको पूरा करती है और सन 2011 में सऊदी अरब की तेल से आमदनी 560 अरब डालर तक पहुंच गयी जिसकी वजह से यह देश दुनिया की 24 अर्थ व्यवस्थाओं में गिना जाने लगा। वही आमदनी थी जिसमें से 160 अरब डालर खर्च करके सऊदी अरब के तत्कालीन नरेश " मलिक अब्दुल्लाह " ने अरब जगत में क्रांतियों की बाढ़ को अपने देश में घुसने से रोक दिया लेकिन यमन के युद्ध ने अब जिस तरह से सऊदी अरब की कमर तोड़ दी है उसके बाद इस तरह के खर्चे अब सऊदी अरब के लिए सपना ही हैं।
सऊदी अरब की समस्या यह है कि वह गत 30 वर्षों में कई पंच वर्षीय योजनाओं के बावजूद तेल पर आधारित अर्थ व्यवस्था से बाहर निकलने में सफल नही हो पाया है।
सऊदी अरब प्रति व्यक्ति आय में दुनिया का 55वां देश है जो हैरत की बात है। अस्ल में सऊदी अरब में तेल का प्रयोग बहुत बढ़ रहा है और अगर यही सिलसिला जारी रहा तो सन 2035 तक सऊदी अरब में तेल की खपत उसकी पैदावार से ज़्यादा हो जाएगी। इससे बचने के लिए उसे गैस आयात करना पड़ेगा और गैस तो उसके दो बड़े प्रतिस्पर्धियों के पास ही है। सऊदी अरब में सिर्फ पेट्रोकेमिकल में कुछ विकास हुआ है।
सऊदी अरब का क्या होगा?
सवाल यह है कि तेल की गिरावट की इस सुनामी में सऊदी अरब का होगा क्या?
सऊदी अरब की जो हालत है उसमें उसे एक बार फिर अपने विदेशी मुद्रा भंडार की शरण में जाना पड़ेगा जो यमन युद्ध शुरु होने के बाद से लगातार कम हो रहा है। इन सब की ज़िम्मेदारी, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पर है। जब से मुहम्मद बिन सलमान, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बने हैं सऊदी अरब का विदेशी मुद्रा भंडार 723 अरब डालर से घट कर 499 अरब डालर हो गया है। सऊदी अरब में सन 2013 में सालाना प्रति व्यक्ति आमदनी 25243 डालर थी जो 2018 में 23338 हो गयी। इन सब से यही पता चलता है कि तेल का युग बीत चुका है। सऊदी अरब को हालात का मुकाबला करने के लिए फौरन टैक्स बढ़ाना होगा और खर्च भी कम करना होगा लेकिन शायद सऊदी अरब यह काम न कर पाए।
ईरान क्यों इस संकट में सऊदी अरब से ज़्यादा मज़बूत साबित हुआ?
सऊदी अरब के लिए सब से बड़े दुख की बात यह है कि इलाक़े में उसका सब से बड़ा प्रतिस्पर्धी अर्थात ईरान इस प्रकार के संकट के सामने उससे कई गुना ज़्यादा मज़बूत है। अस्ल में दो साल पहले जब अमरीका परमाणु समझौते से बाहर निकला और ईरान पर प्रतिबंध लगा दिये तो उसी समय से ईरान की तेल की आमदनी प्रभावित हुई थी इस लिए ईरान पहले से ही तैयार था।
हालांकि इस दबाव से ईरान में हालात काफी खराब हुई और विदेशी मुद्रा चार गुना बढ़ गयी लेकिन इस दबाव की वजह से ईरान की 40 वर्षों की इच्छा पूरी हो गयी और उसकी अर्थ व्यवस्था तेल की धुरी से हटने लगी। अब आईएमएफ का कहना है कि ईरान का सन 2020 में आर्थिक विकास सकारात्मक हो जाएगा।
इन हालात का एक बड़ा फायदा ईरान को यह हुआ कि वह अपनी अर्थ व्यवस्था से तेल को बाहर करने के लिए एक व्यवस्था बनाने में सफल हो गया यह वही व्यवस्था है जिसकी सऊदी अरब की बहुत इच्छा है। इसके अलावा ईरान के पास सऊदी अरब की तुलना विविधता बहुत अधिक है। ईरान के पास सऊदी अरब के विपरीत कृषि योग्य भूमि है जिसकी वजह से वह खाद्य पदार्थ में आत्मनिर्भर बन सकता है। सऊदी अरब ने भी गेंहू की खेती शुरु की थी लेकिन उसके भूमिगत जल भंडार सूख गये जिसकी वजह से यह परियोजना विफल हो गयी। आज इराक़ के बाद पश्चिमी एशिया में सऊदी अरब खादय पदार्थों का आयात करने वाला सब से बड़ा देश है।
ईरान विजेता बन कर उभरेगा
अब विशेषज्ञ भी कहने लगे हैं कि क्षेत्र में समीकरण ईरान के हित में बदल रहा है। सऊदी अरब यमन के दलदल में छटपटा रहा है और उसके निकटवर्ती घटक, यूएई ने ईरान से बात चीत शुरु कर दी है। बिन ज़ायद ने बश्शार असद को फोन किया, क्षेत्रीय देश और संगठन बड़ी तेज़ी से उस मोर्चे से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं जिसका नेतृत्व ईरान करता है। वैसे इसका यह मतलब नहीं है कि तेल का यह संकट ईरान और क्षेत्रीय देशों की सभी समस्याओं का निवारण कर देगा लेकिन यह लग रहा है कि इस से शायद सऊदी नेताओं को बुद्धि आ जाए। कोरोना के बाद बदले हालात पश्चिमी एशिया में बहुत जल्द सब को नज़र आने लगेंगे।